UP Board Class 12 Hindi Question Paper 2024 PDF (Code 301 DC) is available for download here. The Hindi exam was conducted on February 22, 2024 in the Evening Shift from 2 PM to 5:15 PM. The total marks for the theory paper are 100. Students reported the paper to be easy to moderate.
UP Board Class 12 Hindi Question Paper 2024 (Code 301 DC) with Solutions
| UP Board Class 12 Hindi Question Paper 2024 PDF | UP Board Class 12 Hindi Solutions 2024 PDF |
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Question 1(क):
हिन्दी गद्य-साहित्य में 'शुक्लयुग' की समय-सीमा है :
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'शुक्लयुग' हिन्दी गद्य-साहित्य का एक महत्वपूर्ण काल था, जो सन् 1915 ई. से सन् 1935 ई. तक माना जाता है। इस युग में प्रमुख लेखक जैसे कि आचार्य रामचंद्र शुक्ल, जवाहरलाल नेहरू और हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने योगदान से साहित्य की दिशा को नया रूप दिया। Quick Tip: 'शुक्लयुग' का नाम आचार्य रामचंद्र शुक्ल के नाम पर पड़ा है, और यह युग हिन्दी गद्य साहित्य के उत्थान का समय था।
Question 1(ख):
निम्नलिखित में से कहानीकार और उनके द्वारा लिखित कहानी का ग़लत युग्म है :
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'ग्यारह वर्ष का समय' कहानी का रचनाकार रामचन्द्र शुक्ल नहीं, बल्कि 'प्रेमचंद' थे। बाकी सभी युग्म सही हैं। इंशाअल्लाह खाँ ने 'रानी केतकी की कहानी', माधव राव सप्रे ने 'एक टोकरी भर मिट्टी', और शिवप्रसाद सिंह ने 'ज़िंदगी और जोंक' लिखी थी। Quick Tip: सही युग्मों को याद रखने के लिए प्रत्येक लेखक की प्रमुख रचनाएँ और उनकी विशिष्ट शैली को समझना सहायक होता है।
डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा लिखित निबंध संग्रह है :
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डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल द्वारा लिखित निबंध संग्रह 'विचार और वितर्क' है। अन्य विकल्पों में से 'कला और संस्कृति' और 'साहित्य का श्रेय और प्रेय' निबंध संग्रह उनके द्वारा नहीं लिखे गए हैं, और 'तुलसीदास चंदन घिसें' भी अलग लेखक की रचना है। Quick Tip: 'विचार और वितर्क' संग्रह में डॉ. वासुदेवशरण अग्रवाल ने सामाजिक और सांस्कृतिक मुद्दों पर अपने विचार व्यक्त किए हैं।
कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' द्वारा लिखित 'संस्मरण' - विधा की रचना है :
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कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' द्वारा लिखित 'भूले-बिसरे चेहरे' संस्मरण विधा की महत्वपूर्ण रचना है। यह पुस्तक उनके जीवन के अनुभवों और समाजिक घटनाओं पर आधारित है। बाकी विकल्प भी उनके अन्य कार्य हैं, लेकिन 'भूले-बिसरे चेहरे' विशेष रूप से संस्मरण शैली में लिखा गया है। Quick Tip: संस्मरण विधा में लेखक अपने व्यक्तिगत अनुभवों और यादों को प्रस्तुत करते हैं, जो अक्सर वास्तविक घटनाओं और व्यक्तित्वों से जुड़ी होती हैं।
'वैचारिकी शोध और बोध' कृति के रचनाकार हैं :
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'वैचारिकी शोध और बोध' कृति के रचनाकार प्रो. जी. सुंदर रेड्डी हैं। यह कृति विचारधारा और समाजिक मुद्दों पर आधारित शोधपरक विश्लेषण प्रस्तुत करती है। अन्य विकल्पों में दिए गए लेखक अन्य कृतियों के लिए प्रसिद्ध हैं, लेकिन इस कृति के लेखक प्रो. जी. सुंदर रेड्डी हैं। Quick Tip: वैचारिकी शोध और बोध जैसी कृतियाँ समाजिक, सांस्कृतिक और दार्शनिक मुद्दों पर गहन विचार प्रस्तुत करती हैं, जो शोध की महत्वपूर्ण विधाओं में आती हैं।
Question 2(क):
'भवानीप्रसाद मिश्र' निम्नलिखित में से किस 'सप्तक' में संकलित हैं ?
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'भवानीप्रसाद मिश्र' की रचनाएँ 'दूसरा सप्तक' में संकलित हैं। यह सप्तक हिंदी कविता में नई दिशाओं की ओर अग्रसर हुआ था, जिसमें आधुनिक कविता के रूप में कई नई विचारधाराएँ प्रस्तुत की गईं। Quick Tip: 'दूसरा सप्तक' का काव्य आंदोलन हिंदी साहित्य में नया मोड़ था, जिसमें कविता में विचारधारा और सामाजिक दृष्टिकोण को प्रमुखता दी गई।
Question 2(ख):
कौन-सा काव्यान्दोलन 'स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह' है ?
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'प्रयोगवाद' काव्यान्दोलन 'स्थूल के प्रति सूक्ष्म का विद्रोह' है। इसमें कविता में नवीन प्रयोग किए गए, जो पारंपरिक रूपों से अलग थे। इसमें भाषा, रूप और शैली में बदलाव की कोशिश की गई। अन्य आंदोलनों में या तो सामाजिक उद्देश्य थे या पारंपरिक विचारधारा की अभिव्यक्ति। Quick Tip: 'प्रयोगवाद' कविता में रचनात्मकता और नवीनता को प्राथमिकता दी गई, जहां पारंपरिक रूपों के बजाय नए प्रयोग किए गए।
Question 2(ग):
'बीती बिभावरी जाग री' कविता 'प्रसाद' जी की किस कृति में संकलित है ?
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'बीती बिभावरी जाग री' कविता महादेवी वर्मा की काव्यकृति 'लहर' में संकलित है। यह कविता प्रेम और विरह की गहरी भावनाओं को व्यक्त करती है, जो महादेवी वर्मा के सृजनात्मक लेखन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। Quick Tip: 'लहर' काव्यकृति में महादेवी वर्मा की छायावादी शैली का स्पष्ट प्रभाव देखने को मिलता है, जिसमें प्रेम, विरह और प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण है।
Question 2(घ):
निम्नलिखित में से किस कवि को 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' नहीं मिला है ?
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गजानन माधव मुक्तिबोध को 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' नहीं मिला है। अन्य सभी कवियों ने यह पुरस्कार प्राप्त किया है। मुक्तिबोध हिंदी साहित्य के महान कवि और आलोचक थे, जिनकी रचनाएँ साहित्य में गहरी सोच और विचारशीलता को प्रस्तुत करती हैं। Quick Tip: 'ज्ञानपीठ पुरस्कार' हिंदी साहित्य का सर्वोत्तम साहित्यिक पुरस्कार है, जो देश के महान साहित्यकारों को उनकी विशिष्ट काव्यकृतियों के लिए दिया जाता है।
निम्नलिखित में से कौन-सी 'अज्ञेय' की काव्यकृति नहीं है ?
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'आँगन के पार द्वार' काव्यकृति अज्ञेय की नहीं है। बाकी सभी काव्यकृतियाँ अज्ञेय द्वारा रचित हैं, जिनमें उन्होंने आधुनिक साहित्य की बारीकियों को उद्घाटित किया। Quick Tip: अज्ञेय की काव्यकृतियाँ भारतीय काव्य और साहित्य की आधुनिक प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करती हैं, जो मानवीय संवेदनाओं और चिंतन की गहरी परतों को छूने का प्रयास करती हैं।
धरती माता की कोख में जो अमूल्य निधियाँ भरी हैं, जिनके कारण वह वसुन्धरा कहलाती है उससे कौन परिचित न होना चाहेगा ? लाखों-करोड़ों वर्षों से अनेक प्रकार की धातुओं को पृथ्वी के गर्भ में पोषण मिला है । दिन-रात बहनेवाली नदियों ने पहाड़ों को पीस पीस कर अगणित प्रकार की मिट्टियों से पृथ्वी की देह को सजाया है, । हमारे भावी आर्थिक अभ्युदय के लिए इन सबकी जाँच पड़ता अत्यन्त आवश्यक है । पृथ्वी की गोद में जन्म लेने वाले जड़-पत्थर कुशल शिल्पियों से सँवारे जाने पर अत्यन्त सौन्दर्य का प्रतीक बन जाते हैं ।
3.(क) धरती वसुन्धरा क्यों कहलाती है ?
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धरती वसुन्धरा कहलाती है क्योंकि उसमें अमूल्य निधियाँ भरी हैं, जो जीवन के लिए आवश्यक संसाधन प्रदान करती हैं। पृथ्वी के गर्भ में विभिन्न प्रकार की धातुएं और प्राकृतिक संसाधन होते हैं, जो मनुष्य और अन्य जीवों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
Quick Tip: धरती वसुन्धरा का अर्थ है वह पृथ्वी, जो जीवन के सभी मूलभूत संसाधनों से परिपूर्ण है और जिस पर जीवन का संचार होता है।
3. (ख) पृथ्वी की देह को किसने और किस तरह सजाया है ?
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पृथ्वी की देह को नदियों ने सजाया है। दिन-रात बहने वाली नदियों ने पहाड़ों को पीसकर और अगणित प्रकार की मिट्टियों से पृथ्वी की देह को सुसज्जित किया है, जिससे यह भूमि उपजाऊ और समृद्ध बन गई है।
Quick Tip: नदियाँ पृथ्वी की प्राकृतिक सजावट में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं क्योंकि वे मिट्टियों और खनिजों को एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाती हैं।
3.(ग) 'अगणित' और 'अभ्युदय' शब्दों का अर्थ लिखिए।
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'अगणित' शब्द का अर्थ है 'असंख्य' या 'जो गिनने योग्य न हो'।
'अभ्युदय' शब्द का अर्थ है 'समृद्धि' या 'उत्थान', जो एक सकारात्मक प्रगति को दर्शाता है।
Quick Tip: 'अगणित' और 'अभ्युदय' दोनों शब्द सकारात्मक उन्नति और अनगिनत संभावनाओं को दर्शाते हैं।
3.(घ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
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उपर्युक्त गद्यांश का पाठ 'धरती माता' है, और इसे महात्मा गांधी ने लिखा है। यह गद्यांश पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों और उनके महत्त्व को व्यक्त करता है।
Quick Tip: 'धरती माता' का पाठ पृथ्वी के प्रति हमारे कर्तव्यों और उसके संरक्षण के लिए प्रेरित करता है।
3. (ङ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
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रेखांकित अंश में यह बताया गया है कि पृथ्वी के गर्भ में जो अमूल्य संसाधन हैं, वे जीवन को बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। नदियाँ, पहाड़ और मिट्टियाँ मिलकर पृथ्वी को जीवनदायिनी बनाती हैं। इन संसाधनों का सही उपयोग और परीक्षण भविष्य के आर्थिक विकास के लिए आवश्यक है।
Quick Tip: पृथ्वी के संसाधनों का संरक्षण और विवेकपूर्ण उपयोग ही हमें भविष्य में समृद्धि और स्थिरता की ओर ले जाएगा।
अथव
Question 3:
अथवा: हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था का केन्द्र मानव होना चाहिए जो 'यत् पिण्डे तद् ब्रह्मांडे' के न्याय के अनुसार समष्टि का जीवमान प्रतिनिधि एवं उसका उपकरण है । भौतिक उपकरण मानव के सुख के साधन हैं, साध्य नहीं । जिस व्यवस्था में भिन्नरुचिलोक का विचार केवल एक औसत मानव से अथवा शरीर-मन-बुद्धि- आत्मायुक्त अनेक एषणाओं से प्रेरित पुरुषार्थचतुष्टयशील, पूर्ण मानव के स्थान पर एकांगी मानव का ही विचार किया जाए, वह अधूरी है। हमारा आधार एकात्म मानव है जो अनेक एकात्म समष्टियों का एक साथ प्रतिनिधित्व करने की क्षमता रखता है । एकात्म मानववाद (Integral Humanism) के आधार पर हमें जीवन की सभी व्यवस्थाओं का विकास करना होगा ।
3 (क) मानव के सुख के साधन क्या हैं ?
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मानव के सुख के साधन भौतिक उपकरण हैं, जो मानव के सुख को बढ़ाने के लिए उपयोग किए जाते हैं, लेकिन ये साध्य नहीं हैं। ये केवल मानव के सुख का माध्यम हैं, जो जीवन की समग्र खुशी के लिए आवश्यक हैं।
Quick Tip: मानव के सुख के साधन भौतिक वस्तुएं और संसाधन होते हैं, लेकिन ये कभी भी अंतिम उद्देश्य नहीं होते।
3(ख) जीवन की सभी व्यवस्थाओं का विकास किस आधार पर करना चाहिए ?
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जीवन की सभी व्यवस्थाओं का विकास 'एकात्म मानववाद' के आधार पर करना चाहिए, जो यह मानता है कि एकात्म मानव हर समष्टि का प्रतिनिधित्व करता है और उसी के आधार पर हम समाज और जीवन की व्यवस्थाओं का विकास कर सकते हैं।
Quick Tip: 'एकात्म मानववाद' का विचार समष्टि के पूरे तंत्र को समझने और उसके विकास को प्राथमिकता देने पर आधारित है।
3.(ग) 'समष्टि' तथा 'एषणा' शब्दों का अर्थ लिखिए।
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'समष्टि' शब्द का अर्थ है 'समूह' या 'कुल मिलाकर' किसी समाज या तंत्र का प्रतिनिधित्व करना।
'एषणा' का अर्थ है 'इच्छा' या 'आकांक्षा', जो किसी व्यक्ति के मन में उत्पन्न होने वाली भावनाओं को दर्शाती है।
Quick Tip: 'समष्टि' समाज या समूह का विस्तृत दृष्टिकोण है, जबकि 'एषणा' व्यक्ति की आंतरिक इच्छाओं को व्यक्त करता है।
3.(घ) उपर्युक्त गद्यांश के पाठ और लेखक का नाम लिखिए।
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उपर्युक्त गद्यांश का पाठ 'एकात्म मानववाद' है, और इसे पं. दीनदयाल उपाध्याय ने लिखा है। यह गद्यांश समाज और जीवन की व्यवस्थाओं के विकास के लिए एकात्म मानववाद के सिद्धांतों को प्रस्तुत करता है।
Quick Tip: पं. दीनदयाल उपाध्याय ने 'एकात्म मानववाद' को समाज की समग्रता और संतुलन के लिए एक आधारभूत सिद्धांत के रूप में प्रस्तुत किया।
3. (ङ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
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रेखांकित अंश में यह कहा गया है कि भौतिक उपकरण मानव के सुख के साधन होते हैं, न कि उद्देश्य। यदि हम केवल एकांगी दृष्टिकोण से मानव के विचार करें, तो वह अधूरा होगा। हमें एकात्म मानववाद के सिद्धांत पर जीवन की व्यवस्थाओं का विकास करना चाहिए, जिसमें हर समष्टि का सही प्रतिनिधित्व हो।
Quick Tip: 'एकात्म मानववाद' यह मानता है कि सभी मानव की स्थितियाँ और उनके सुख के साधन एक-दूसरे से जुड़े होते हैं और समग्र दृष्टिकोण से ही जीवन की सही दिशा तय की जा सकती है।
कान्ह-दूत कैधौं ब्रह्म-दूत है पधारे आप, धारे प्रून फेरन कौ मति ब्रजबारी की ।
कहैं 'रत्नाकर' पै प्रीति-रीति जानत ना, ठानत अनीति आनि रीति ले अनारी की ॥
मान्यौ हम, कान्ह ब्रह्म एक ही, कह्यौ जो तुम, तोहूँ हमें भावति न भावना अन्यारी की ।
जैहै बनि बिगरि न बारिधिता बारिधि की, बूँदता बिलैहै बूँद बिबस बिचारी की ॥
4.(क) उपर्युक्त पद्यांश के पाठ और रचयिता का नाम लिखिए।
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उपर्युक्त पद्यांश का पाठ 'रत्नाकर' है, और इसे सूरदास जी ने रचित किया है। यह पद्यांश भगवान श्री कृष्ण की ब्रह्म की अंश में उपस्थिति को व्यक्त करता है।
Quick Tip: सूरदास जी ने भगवान श्री कृष्ण को भक्ति और ब्रह्म के रूप में प्रस्तुत किया, जो भक्ति साहित्य का एक अद्वितीय उदाहरण है।
4.(ख) गोपियों ने किसे और क्यों 'अनारी' कहा है ?
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गोपियों ने श्री कृष्ण को 'अनारी' कहा है क्योंकि वे उन्हें और उनके व्यवहार को समझ नहीं पाईं। गोपियाँ श्री कृष्ण की रासलीला के माध्यम से उनके ब्रह्म रूप का अनुभव नहीं कर पाईं, अत: उन्हें अनाड़ी और अज्ञानी समझा।
Quick Tip: गोपियाँ श्री कृष्ण के परमात्मा रूप को पहचानने में असमर्थ थीं, यही कारण था कि उन्हें 'अनारी' कहा गया।
4.(ग) 'अनीति' और 'भावति' शब्दों का अर्थ लिखिए।
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'अनीति' शब्द का अर्थ है 'अन्याय' या 'गलत तरीका'।
'भावति' शब्द का अर्थ है 'भावना', 'चाहत' या 'प्रेम'।
Quick Tip: 'अनीति' और 'भावति' दोनों शब्दों में समाज और मानव व्यवहार के दो विभिन्न पहलुओं को व्यक्त किया गया है।
4.(घ) 'कान्ह-दूत कैधौं ब्रह्म- दूत है पधारे आप' - पंक्ति में कौन-सा अलंकार प्रयुक्त है ?
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इस पंक्ति में 'रूपक अलंकार' प्रयुक्त है। भगवान श्री कृष्ण को 'कान्ह-दूत' और 'ब्रह्म-दूत' के रूप में व्यक्त किया गया है, जिससे उनकी दिव्यता और सम्पूर्ण ब्रह्म में उपस्थिति को चित्रित किया गया है।
Quick Tip: रूपक अलंकार में किसी वस्तु या व्यक्ति का गुण, रूप, या अवस्था किसी अन्य वस्तु से संबंधित करके व्यक्त किया जाता है।
4.(ङ) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
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रेखांकित अंश में सूरदास जी यह व्यक्त कर रहे हैं कि जैसे समुद्र में बदलते हुए जल की तरह भगवान श्री कृष्ण का रूप है। वह निर्मल और शुद्ध ब्रह्म के रूप में सबका पालन करते हैं, जो परिवर्तनशील होते हुए भी स्थिर होते हैं। यह अंश उनकी अद्वितीय स्थिति और भक्ति के महत्व को प्रदर्शित करता है।
Quick Tip: सूरदास जी ने भगवान श्री कृष्ण के ब्रह्म रूप की विशेषताओं को व्यक्त करते हुए उनकी महिमा और अपार भक्ति को स्पष्ट किया।
अथव
Question 4:अथवा: मैं कब कहता हूँ जग मेरी दुर्धर गति के अनुकूल बने,
मैं कब कहता हूँ जीवन-मरु नंदन कानन का फूल बने ?
काँटा कठोर है तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है,
मैं कब कहता हूँ वह घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने ?
मैं कब कहता हूँ मुझे युद्ध में कहीं न तीखी चोट मिले ?
मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले ?
4.(क) उपर्युक्त पद्यांश के पाठ और रचयिता का नाम लिखिए।
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उपर्युक्त पद्यांश का पाठ 'रचनाएँ' है, जिसे कवि महादेवी वर्मा ने रचित किया है। इस पद्यांश में कवि अपने जीवन के संघर्ष और अद्वितीयता की ओर संकेत कर रहे हैं।
Quick Tip: महादेवी वर्मा की रचनाएँ जीवन के विविध पक्षों और संघर्षों का गहरा विश्लेषण करती हैं।
4.(ख) रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।
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रेखांकित अंश में कवि यह कह रहे हैं कि वह कभी यह नहीं चाहते कि उनका जीवन केवल सरल और सुखमय हो, बल्कि वह चाहते हैं कि जीवन के संघर्ष और कठिनाइयाँ उन्हें न केवल परिष्कृत करें, बल्कि उनके व्यक्तित्व को भी मजबूत बनाएं। काँटे की कठोरता और तीखापन उसकी मर्यादा की पहचान हैं, यही सोच वे जीवन के प्रति अपनाते हैं।
Quick Tip: कवि जीवन में संघर्ष और कठिनाइयों को एक मूल्यवान अनुभव मानते हैं, जो उनके व्यक्तित्व और अस्तित्व को परिपूर्ण करता है।
4.(ग) 'दुर्धर' और 'प्रांतर' शब्द का अर्थ लिखिए।
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'दुर्धर' का अर्थ है 'बहुत कठिन' या 'अत्यधिक कठिन', और 'प्रांतर' का अर्थ है 'क्षेत्र' या 'किसी स्थान का विस्तार'।
Quick Tip: 'दुर्धर' और 'प्रांतर' दोनों शब्दों में प्रकृति और स्थान की गहरी कठिनाई और विशालता का संकेत मिलता है।
4.(घ) 'जीवन-मरु नंदन कानन का फूल बने' में कौन-सा अलंकार प्रयुक्त है ?
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इस पंक्ति में 'रूपक अलंकार' प्रयुक्त है। जीवन को मरु-नंदन के फूल से जोड़कर व्यक्त किया गया है, जो जीवन के शुद्ध और निस्वार्थ रूप को प्रदर्शित करता है।
Quick Tip: रूपक अलंकार में किसी वस्तु या विचार को अन्य वस्तु से तुलना करके उसकी विशिष्टता को स्पष्ट किया जाता है।
4.(ङ). 'मैं कब कहता हूँ प्यार करूँ तो मुझे प्राप्ति की ओट मिले ?' – इसका तात्पर्य स्पष्ट कीजिए।
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इस पंक्ति का तात्पर्य यह है कि कवि अपने प्यार में किसी प्रकार की प्राप्ति या स्वार्थ की आशा नहीं रखते। वह केवल प्रेम करने की शुद्ध भावना में विश्वास करते हैं, और चाहते हैं कि प्रेम का कोई लोभ या स्वार्थ न हो।
Quick Tip: यह पंक्ति प्रेम की निष्कलंकता और स्वार्थ से परे होने की मानसिकता को दर्शाती है, जहाँ केवल शुद्ध भावनाओं का आदान-प्रदान होता है।
5.(क) निम्नलिखित में से किसी एक लेखक का जीवन-परिचय देते हुए उनकी भाषा-शैली पर प्रकाश डालिए: (अधिकतम शब्द - सीमा 80 शब्द)
(i) वासुदेवशरण अग्रवाल
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वासुदेवशरण अग्रवाल का जन्म 1893 में हुआ था और वे हिंदी साहित्य के एक अत्यंत प्रभावशाली कवि, निबंधकार और विचारक थे। उनकी कविताएँ साधारण जन के जीवन, भारतीय संस्कृति, और जीवन के उत्थान के प्रति समर्पण से प्रेरित थीं। उनका लेखन सरल, लेकिन गहरे भावनात्मक आयाम से भरपूर था। उन्होंने भारतीय समाज में व्याप्त कुरीतियों और आंतरिक संघर्षों को अपनी रचनाओं में उजागर किया। उनका साहित्य सामाजिक और सांस्कृतिक जागरूकता पैदा करने का माध्यम था। वे भारतीय साहित्य में न केवल कविता, बल्कि निबंध और आलोचना के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। उनकी कविता में जीवन के दर्द और संघर्षों को प्रकट करते हुए समाज के लिए एक नया दृष्टिकोण प्रस्तुत किया गया था। वासुदेवशरण अग्रवाल के कार्यों में संवेदनशीलता, सृजनात्मकता और गहरी सामाजिक चेतना का मिश्रण था। उन्होंने साहित्य में वास्तविकता और मानवीय मूल्यों को प्रमोट किया और एक बेहतर समाज बनाने के लिए साहित्य को शक्तिशाली माध्यम माना। उनकी रचनाएँ आज भी समाज में प्रासंगिक हैं। Quick Tip: वासुदेवशरण अग्रवाल की कविताएँ भारतीय समाज की गहरी संवेदनाओं और सामाजिक मुद्दों को उजागर करती हैं, जो उन्हें एक महत्वपूर्ण साहित्यकार बनाती हैं। उनका लेखन आज भी समाज में जागरूकता और बदलाव की प्रेरणा देता है।
5.(क) (ii) डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम
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डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का जन्म 15 अक्टूबर 1931 को तमिलनाडु के रामेश्वरम में हुआ था। वे भारत के 11वें राष्ट्रपति रहे और भारतीय अंतरिक्ष और मिसाइल कार्यक्रमों के प्रमुख वैज्ञानिक थे। उन्होंने भारतीय रक्षा क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया और भारत को मिसाइल शक्ति के रूप में स्थापित किया। उनका लेखन प्रेरणादायक और राष्ट्र निर्माण की भावना से भरपूर था। उनकी प्रसिद्ध पुस्तकें जैसे "विंग्स ऑफ फायर," "इंडिया 2020," और "आइडियाज फॉर न्यू इंडिया" ने न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण को बल दिया बल्कि भारत के भविष्य के लिए उनकी दृष्टि और योजनाओं को भी उजागर किया। उनका जीवन पूरी दुनिया के लिए प्रेरणा का स्रोत बना। उनकी लेखनी में सत्य, ईमानदारी, और उद्देश्य के प्रति समर्पण की गहरी समझ होती थी, जो भारतीय युवाओं को प्रेरित करती थी। उनका लेखन सरल, सटीक और उद्देश्यपूर्ण होता था, जो पाठकों को व्यक्तिगत और राष्ट्रीय स्तर पर बेहतर कार्य करने की प्रेरणा देता था। वे भारतीय विज्ञान और तकनीकी क्षेत्र के एक महान नेता थे जिनकी धरोहर हमारे समाज के लिए अमूल्य है। Quick Tip: डॉ. ए. पी. जे. अब्दुल कलाम का लेखन भारतीय युवाओं को उनके कर्तव्यों और राष्ट्र निर्माण की दिशा में प्रेरित करता है। उनका कार्य हमें यह सिखाता है कि किसी भी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सच्चाई, मेहनत और समर्पण आवश्यक हैं।
5.(क) (iii) श्री हरिशंकर परसाई
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श्री हरिशंकर परसाई का जन्म 1924 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के प्रमुख लेखक, व्यंग्यकार और निबंधकार थे। उनका लेखन समाज की विभिन्न कुरीतियों, विडंबनाओं और राजनीतिक असत्यताओं पर तीव्र और पैने व्यंग्य के रूप में होता था। उनकी प्रसिद्ध रचनाएँ "रानी नागफनी की कहानी," "वह चाँद है," और "कहानी का अंत" हैं, जिनमें उन्होंने समाज के भेदभाव और असमानता को चित्रित किया है। उनके लेखन में सशक्त सामाजिक संदेश और मानवीय मूल्यों का संरक्षण होता था। परसाई जी ने अपनी रचनाओं में जीवन के सरल, लेकिन कठिन पहलुओं को उठाया और समाज के सामने रखा। उनका व्यंग्य न केवल हास्य उत्पन्न करता था, बल्कि यह समाज को आइना दिखाता था। वे हिंदी साहित्य के सबसे सशक्त व्यंग्यकारों में से एक माने जाते हैं। उनकी भाषा सरल, तीव्र और प्रभावशाली थी, जो समाज की कुरीतियों और दुरावस्थाओं की ओर पाठकों का ध्यान आकर्षित करती थी। उनकी रचनाएँ समाज की जागरूकता और सुधार के लिए एक सशक्त माध्यम रही हैं। Quick Tip: हरिशंकर परसाई का लेखन समाज के कुकृतियों और असत्यताओं को उजागर करता था। वे न केवल एक व्यंग्यकार थे, बल्कि समाज को बेहतर बनाने के लिए उनका कार्य भी प्रेरणादायक था।
5.(ख) निम्नलिखित में से किसी एक कवि का जीवन-परिचय देते हुए उनकी कृतियों पर प्रकाश डालिए: (अधिकतम शब्द - सीमा 80 शब्द )
(i) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिंदी साहित्य के 'आधुनिक हिंदी के जनक' माने जाते हैं। उन्होंने नाटक, कविता, और गद्य साहित्य में योगदान दिया। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं: 'भारत दुर्दशा', 'सत्य हरिश्चन्द्र', और 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति'। उनका लेखन सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना पर केंद्रित था। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिंदी साहित्य में न केवल नए प्रयोग किए, बल्कि भारतीय समाज को जागरूक करने का कार्य भी किया। उनका साहित्य हिंदी के समृद्ध साहित्यिक परंपरा का आधार बना और वे आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रारंभिक नायक बने। उन्होंने हिंदी में नाटक की शुरुआत की और अपने लेखन से भारतीय समाज में जागरूकता और सुधार की आवश्यकता को महसूस कराया। वे भारतीय समाज की पुरानी परंपराओं और रीति-रिवाजों की आलोचना करते हुए उसे सामाजिक सुधार की दिशा में ले जाने की कोशिश करते थे। उनके नाटक और कविताएँ आज भी भारतीय समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।
भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का साहित्य सामाजिक सुधार की ओर प्रेरित करता है। उन्होंने अंधविश्वास, जातिवाद और महिला उत्पीड़न जैसे मुद्दों को अपने लेखन का विषय बनाया। 'सत्य हरिश्चन्द्र' जैसे नाटक ने भारतीय समाज को सही और गलत के बीच अंतर समझाया और सच्चाई की अहमियत को दर्शाया। उनके लेखन में भारतीय समाज की कुरीतियों के खिलाफ एक प्रबल आक्रोश दिखाई देता है।
उनकी रचनाएँ केवल साहित्यिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक परिवर्तन और जागरूकता का भी प्रतीक हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रचनाओं में भारतीय समाज को एक नया दृष्टिकोण और दिशा मिली, जिससे उन्होंने समाज की गलत परंपराओं और आदतों को चुनौती दी। Quick Tip: कवियों के जीवन-परिचय में उनके साहित्यिक युग और रचनाओं की मुख्य विशेषताएँ शामिल करें। उनके साहित्य में सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना को प्रमुखता दी जाती है।
5.(ख) (ii) जयशंकर प्रसाद
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जयशंकर प्रसाद का जन्म 1889 में हुआ था। वे हिंदी साहित्य के सबसे महान कवियों और नाटककारों में से एक माने जाते हैं। वे छायावाद के प्रमुख कवि थे, जिन्होंने अपनी काव्यशैली और नाटकों के माध्यम से हिंदी साहित्य में एक नया मोड़ दिया। उनकी रचनाएँ प्रेम, सौंदर्य, और आत्मबोध से भरपूर होती थीं। 'कुंअरमोहल्ला', 'आत्माराम', 'स्कंदगुप्त', 'झरना' जैसी उनकी प्रमुख कृतियाँ भारतीय साहित्य में अमूल्य धरोहर मानी जाती हैं। प्रसाद जी का लेखन समाज के गहरे परिवर्तनों, भारतीय इतिहास और आत्मशक्ति के साथ जुड़ा था। उन्होंने साहित्य के माध्यम से भारतीय संस्कृति, समाज, और दर्शन के महत्व को व्यक्त किया। वे जीवन की संपूर्णता और सत्य की खोज में नायक के रूप में विद्यमान रहे। उनका साहित्य आज भी गहरी संवेदनाओं और विचारों का प्रतीक बना हुआ है।
जयशंकर प्रसाद की कविता में गहरी भावना और सौंदर्य की खोज होती थी, जो उनके व्यक्तित्व और साहित्यिक दृष्टिकोण को दर्शाती है। वे न केवल कविता के माध्यम से, बल्कि अपने नाटकों और कथाओं के जरिए भी समाज में बदलाव और जागरूकता का आह्वान करते थे। उनका लेखन धार्मिक, सांस्कृतिक, और सामाजिक संदर्भों को समेटे हुए था, और उन्होंने भारतीय साहित्य में छायावाद के रूप में नये रंग भरने का कार्य किया। उनकी रचनाओं में आत्मनिर्भरता, जीवन के प्रति एक गहरी समझ और अपने अस्तित्व को साबित करने की आकांक्षा व्यक्त की गई है। प्रसाद जी का लेखन समाज के हर वर्ग को प्रेरित करने वाला था।
उनकी कविता और नाटक ना केवल साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं, बल्कि वे समय की आंतरिक संवेदनाओं को भी व्यक्त करती हैं। उनके लेखन में एक अद्भुत आदर्शवाद और आत्मबोध की गहरी झलक देखने को मिलती है। इसीलिए वे आज भी हिंदी साहित्य के महानतम रचनाकारों में गिने जाते हैं। Quick Tip: जयशंकर प्रसाद का साहित्य केवल भावनाओं से भरा नहीं था, बल्कि उसमें भारतीय समाज, संस्कृति और नारी के आत्म-संस्कार का संदेश भी था। उनकी कविताओं ने भारतीय साहित्य को नया रूप दिया।
5.(ख) (iii) महादेवी वर्मा
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महादेवी वर्मा का जन्म 1907 में हुआ था। वे हिंदी साहित्य की प्रमुख कवि, निबंधकार और लेखिका थीं। उनका लेखन भावनाओं, संवेदनाओं और स्त्री-चेतना से गहरे जुड़ा था। वे छायावाद के प्रमुख स्तंभों में से एक मानी जाती हैं। उनकी कविताओं में नारी के अस्तित्व, संघर्ष और समाज में उसकी भूमिका को उजागर किया गया है। 'नीलिमा', 'संस्कार', 'दीपशिखा', 'यात्रिका' जैसी उनकी प्रमुख कृतियाँ हिंदी साहित्य में अमूल्य हैं। महादेवी वर्मा की कविताओं में अत्यधिक सूक्ष्मता, संवेदनशीलता और आत्मनिर्भरता का भाव था। उनकी रचनाओं में न केवल स्त्री जीवन की परछाइयाँ थीं, बल्कि जीवन के संघर्ष और उस पर विजय पाने की अद्भुत शक्ति भी दिखती थी। उन्होंने हिंदी कविता को समृद्ध किया और नारी शक्ति को भी कविता के माध्यम से सशक्त किया। उनकी काव्यशैली में निराशा के बावजूद जीवन के प्रति गहरी उम्मीद और संवेदनशीलता थी। महादेवी वर्मा का योगदान हिंदी साहित्य में अनमोल और अत्यधिक प्रभावशाली है। Quick Tip: महादेवी वर्मा की कविताओं में स्त्री के संघर्ष और आत्मनिर्भरता की भावना प्रमुख रूप से दिखती है, और उनका साहित्य नारीवाद के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है।
Question 6:
'बहादुर' कहानी के आधार पर 'बहादुर' का चरित्र चित्रण कीजिए।( अधिकतम शब्द - सीमा 80 शब्द)
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'बहादुर' कहानी का नायक बहादुर एक साधारण और परिश्रमी व्यक्ति है, जो अपनी कड़ी मेहनत और साहस के द्वारा अपने परिवार की जिम्मेदारियों का निर्वहन करता है। उसकी ईमानदारी, समर्पण और संघर्षशीलता उसे अद्वितीय बनाती है। कहानी में बहादुर का चरित्र यह दर्शाता है कि साहस और मेहनत से किसी भी कठिनाई का सामना किया जा सकता है। उसका संघर्ष और नैतिक बल उसे कहानी का मुख्य नायक बनाता है। बहादुर का संघर्ष केवल बाहरी कठिनाइयों से नहीं, बल्कि अपने भीतर के डर और निराशाओं से भी है। उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति और आत्मविश्वास उसे अंततः विजय दिलाते हैं। वह हमेशा सत्य और न्याय के पक्ष में खड़ा होता है और किसी भी परिस्थिति में अपने नैतिक मूल्यों से समझौता नहीं करता। उसकी यह विशेषताएँ उसे न केवल एक साहसी व्यक्ति बल्कि एक आदर्श भी बनाती हैं, जो दूसरों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। Quick Tip: 'बहादुर' कहानी में नायक के संघर्ष और नैतिक बल को दिखाते हुए यह संदेश दिया गया है कि कठिन समय में भी यदि हम अपने सिद्धांतों पर कायम रहते हैं, तो हम सफलता प्राप्त कर सकते हैं।
Question 6:
अथवा: 'पंचलाइट' अथवा 'खून का रिश्ता' कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए।
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'पंचलाइट' और 'खून का रिश्ता' दोनों कहानियों का उद्देश्य समाज में मानवीय संबंधों की जटिलताओं और उनके प्रभावों को उजागर करना है। 'पंचलाइट' में मानवीय संवेदनाओं और रिश्तों के बदलते रूप को दिखाया गया है, जिसमें प्रेम, त्याग और समझौते की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। यह कहानी यह दर्शाती है कि जीवन के संघर्षों में सच्ची मानवीय संवेदनाएँ और रिश्ते ही हमारी सबसे बड़ी ताकत बन सकते हैं। दूसरी ओर, 'खून का रिश्ता' में रक्त संबंधों के बावजूद, उनके बीच के झूठ, धोखाधड़ी और स्वार्थी प्रवृत्तियाँ प्रमुखता से प्रस्तुत की गई हैं। इस कहानी में लेखक ने रिश्तों की वास्तविकता को उजागर करते हुए यह दिखाया है कि रक्त के रिश्ते भी तभी सशक्त होते हैं, जब उनमें विश्वास और सच्चाई हो। दोनों कहानियाँ मानवीय रिश्तों की सच्चाई और उनके भीतर की जटिलताओं को दर्शाती हैं, जो पाठकों को सोचने पर मजबूर करती हैं। Quick Tip: 'पंचलाइट' और 'खून का रिश्ता' में मानवीय रिश्तों की पेचीदगी और उनके भीतर की सच्चाई को दर्शाया गया है, जो यह बताते हैं कि रिश्ते केवल खून से नहीं, बल्कि विश्वास और समझ से बनते हैं।
स्वपठित खण्डकाव्य के आधार पर किसी एक खण्डकाव्य के एक प्रश्न का उत्तर लिखिए: (अधिकतम शब्द - सीमा 80 शब्द)
(क) 'रश्मिरथी' खण्डकाव्य के आधार पर 'कर्ण' का चरित्र-चित्रण कीजिए।
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'रश्मिरथी' खण्डकाव्य में कर्ण का चरित्र एक जटिल और प्रेरणादायक है। कर्ण का जन्म अपमानजनक स्थिति में हुआ था, लेकिन उसने अपने जीवन को संघर्ष, बलिदान और निष्ठा से परिपूर्ण किया। कर्ण का चरित्र धर्म, न्याय, मित्रता और शौर्य का प्रतीक है।
कर्ण का जन्म और उसकी अपमानजनक स्थिति: कर्ण का जन्म कुंती से हुआ था, लेकिन उसे अपने जन्म का कोई अधिकार नहीं था। उसकी माँ ने उसे छोड़ दिया और वह आचार्य परशुराम के पास शिक्षा प्राप्त करने गया। कर्ण के जीवन में जन्म से जुड़े कई संघर्ष थे, लेकिन उसने कभी अपने अस्तित्व से हार नहीं मानी।
कर्ण की मित्रता और वचनबद्धता: कर्ण का दुर्योधन के प्रति गहरी मित्रता थी, और वह हमेशा अपने मित्र के लिए निष्ठावान रहा। उसका यह गुण उसे एक महान नायक के रूप में स्थापित करता है।
कर्ण की वीरता और शौर्य: कर्ण ने युद्ध भूमि में अपनी वीरता का परिचय दिया, लेकिन उसे हमेशा धर्म और न्याय के प्रति संदेह रहा। वह हमेशा अपने कर्तव्यों और मित्रता के प्रति निष्ठावान रहा।
कर्ण का शाप और अंत: कर्ण के जीवन में कई शाप थे जो उसे अंत तक परेशान करते रहे। उसका जीवन एक कर्तव्य और धर्म के बीच जूझते हुए अंत होता है, जो उसे एक महान नायक बना देता है।
कर्ण का चरित्र संघर्षों और बलिदानों का प्रतीक है, जो अंततः उसे महानता और सम्मान की प्राप्ति का मार्ग दिखाता है। Quick Tip: कर्ण के चरित्र का अध्ययन करते समय उसके जन्म, मित्रता, संघर्ष और बलिदान पर ध्यान दें, जो उसे एक महान नायक बनाते हैं।
7.(क) अथवा 'रश्मिरथी' खण्डकाव्य के 'तृतीय सर्ग' की घटना का उल्लेख कीजिए।
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'रश्मिरथी' के तृतीय सर्ग में कर्ण की वीरता और उसके मानसिक संघर्ष की प्रमुख घटना को दर्शाया गया है। इस सर्ग में कर्ण के जीवन की कठिनाइयाँ और उसकी मानसिक स्थिति पर प्रकाश डाला गया है।
कर्ण का वचन और मित्रता: तृतीय सर्ग में कर्ण अपने मित्र दुर्योधन के प्रति अपनी निष्ठा और वचनबद्धता को व्यक्त करता है। वह दुर्योधन के लिए किसी भी बलिदान को तैयार रहता है, और यह उसकी वचनबद्धता और मित्रता का प्रतीक है।
कर्ण का आत्मसंघर्ष: इस सर्ग में कर्ण के भीतर चल रहे आत्मसंघर्ष को उजागर किया गया है। वह हमेशा अपने अस्तित्व और अपने धर्म को लेकर जूझता है। उसकी स्थिति यह बताती है कि वह अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान रहते हुए भी अपनी अस्मिता के संघर्ष में उलझा हुआ है।
कर्ण का बलिदान: इस सर्ग में कर्ण के द्वारा किए गए बलिदानों का उल्लेख है, जिसमें उसने अपने स्वयं के शाप और कर्तव्यों को स्वीकार किया और अपने जीवन को महानता की ओर अग्रसर किया।
तृतीय सर्ग में कर्ण का चित्रण उसकी कर्तव्यनिष्ठता, संघर्ष और बलिदान के रूप में किया गया है, जो उसे एक महान नायक के रूप में प्रस्तुत करता है। Quick Tip: तृतीय सर्ग में कर्ण के आत्मसंघर्ष और मित्रता की वचनबद्धता पर ध्यान दें, जो उसके जीवन के महत्वपूर्ण मोड़ को दर्शाता है।
7.(ख) 'त्यागपथी' खण्डकाव्य के आधार पर 'हर्षवर्धन' का चरित्रांकन कीजिए।
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'त्यागपथी' खण्डकाव्य में हर्षवर्धन का चरित्र एक आदर्श और महान नायक के रूप में चित्रित किया गया है। वह एक सम्राट होने के बावजूद अपने कर्तव्यों और समाज के कल्याण के प्रति पूरी तरह से समर्पित था।
हर्षवर्धन का त्याग और निष्ठा: हर्षवर्धन अपने प्रजा के कल्याण के लिए व्यक्तिगत सुखों का त्याग करने वाला सम्राट था। उसने सत्ता और भौतिक सुखों के बजाय धार्मिक और समाजिक कल्याण को प्राथमिकता दी।
हर्षवर्धन की धार्मिकता और कर्तव्यनिष्ठा: वह एक धर्मनिष्ठ और कर्तव्यपरायण सम्राट था, जिसने अपने शासनकाल में धार्मिक और सामाजिक सुधारों को प्राथमिकता दी। उसकी धार्मिक निष्ठा उसे एक आदर्श नायक बनाती है।
हर्षवर्धन का बलिदान: हर्षवर्धन अपने प्रजा की भलाई के लिए खुद को बलिदान करने को तैयार था। वह यह मानता था कि एक सम्राट का मुख्य कर्तव्य अपने प्रजा की भलाई में निहित है।
हर्षवर्धन का न्याय और दया: हर्षवर्धन ने हमेशा न्याय और दया का पालन किया। वह अपने साम्राज्य में शांति और न्याय सुनिश्चित करने के लिए दृढ़ था, और उसका चरित्र त्याग, बलिदान और समाज के प्रति दया की मिसाल प्रस्तुत करता है।
हर्षवर्धन का चरित्र त्याग, निष्ठा, बलिदान और न्याय की प्रेरणा देता है, जो उसे एक आदर्श शासक और नायक बनाता है। Quick Tip: हर्षवर्धन का चरित्र धर्म, त्याग और कर्तव्य के आदर्शों से प्रेरित था। उसकी जीवन यात्रा समाज की भलाई और न्याय की मिसाल प्रस्तुत करती है।
7.(ख) अथवा 'त्यागपथी' खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए।
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'त्यागपथी' खण्डकाव्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
धार्मिकता और त्याग: इस काव्य में मुख्य रूप से त्याग, बलिदान और धार्मिक निष्ठा का चित्रण किया गया है। इसमें मुख्य पात्र हर्षवर्धन का त्याग और उसकी धार्मिकता को प्रमुखता से दिखाया गया है।
मानवीय मूल्यों का संरक्षण: काव्य में समाज और मानवता के महत्व को स्पष्ट किया गया है। इसमें यह बताया गया है कि एक व्यक्ति को अपने कर्तव्यों और समाज के लिए त्याग करना चाहिए।
सामाजिक उत्तरदायित्व: काव्य में हर्षवर्धन को समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने वाले नायक के रूप में चित्रित किया गया है। वह हमेशा अपने प्रजा के कल्याण के लिए कार्य करता है।
अद्वितीय काव्यशैली: 'त्यागपथी' की काव्यशैली अत्यधिक प्रभावशाली और सुंदर है। इसमें शब्दों की गहराई और भावनाओं का सामंजस्य दिखाई देता है, जो पाठक को प्रेरित करता है।
आदर्श शासक का चित्रण: काव्य में हर्षवर्धन के माध्यम से एक आदर्श शासक की भूमिका को उजागर किया गया है, जो धर्म, निष्ठा और न्याय के सिद्धांतों का पालन करता है।
इस खण्डकाव्य का मुख्य उद्देश्य त्याग, बलिदान, और समाज के प्रति जिम्मेदारी का संदेश देना है, जो हर्षवर्धन के चरित्र के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है। Quick Tip: 'त्यागपथी' खण्डकाव्य में त्याग, बलिदान, और कर्तव्य की महत्वपूर्ण शिक्षा दी गई है, जो आज भी हमें जीवन के आदर्श मार्ग पर चलने की प्रेरणा देती है।
7.(ग) 'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य के आधार पर 'दशरथ' का चरित्र चित्रण कीजिए।
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'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य में दशरथ का चरित्र अत्यधिक भावनात्मक और नैतिक दृष्टिकोण से चित्रित किया गया है। वह एक आदर्श सम्राट और पिता के रूप में दिखाए गए हैं।
दशरथ का प्रेम और कर्तव्य: दशरथ अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान और अपने परिवार से अत्यधिक प्रेम करने वाले व्यक्ति हैं। वह एक आदर्श शासक हैं, जिन्होंने अपने राज्य की भलाई के लिए हमेशा उचित निर्णय लिए।
श्रवणकुमार के प्रति जिम्मेदारी: दशरथ का श्रवणकुमार के प्रति विशेष स्नेह था, और उन्होंने अपने जीवन के कर्तव्यों को निभाने के लिए अत्यधिक बलिदान किए। वह अपनी जिम्मेदारियों के प्रति सजग थे, लेकिन एक पिता के रूप में वह अपने पुत्र के दुखों को सहन नहीं कर सके।
दशरथ का आंतरिक संघर्ष: दशरथ का चरित्र आंतरिक संघर्षों से भरा हुआ था, खासकर जब उसे श्रवणकुमार के मृत्यु के बाद अपने किए गए वचन के अनुसार बेटे को वनवास भेजने की स्थिति का सामना करना पड़ा।
नैतिकता और विषाद: दशरथ का चरित्र नैतिकता के सिद्धांतों से प्रेरित था, लेकिन उसने जो निर्णय लिया, वह उसे व्यक्तिगत रूप से अत्यधिक दुख और विषाद में डाल दिया। उसकी शोकपूर्ण स्थिति दर्शाती है कि एक आदर्श पिता और सम्राट होने के बावजूद, कभी-कभी निर्णयों के परिणाम बहुत कष्टकारी हो सकते हैं।
दशरथ का चरित्र बलिदान, कर्तव्य, और पिता के प्रति गहरे प्रेम का प्रतीक है, और वह इस काव्य के नायक के रूप में अपना महत्व रखते हैं। Quick Tip: दशरथ का चरित्र हमारे लिए यह संदेश देता है कि कर्तव्य और परिवार के प्रति प्रेम के बीच संतुलन बनाए रखना कठिन होता है, लेकिन सही निर्णय की महत्ता बहुत अधिक होती है।
7.(ग) अथवा 'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का उल्लेख कीजिए।
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'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाएँ निम्नलिखित हैं:
श्रवणकुमार का आगमन: श्रवणकुमार अपने अंधे माता-पिता को वनवास में ले जाने के लिए अपने कंधों पर पालकी उठाकर यात्रा करता है। उसकी यह यात्रा और माता-पिता के प्रति समर्पण कहानी का मुख्य विषय है।
दशरथ से मुठभेड़: श्रवणकुमार के साथ एक दुखद घटना घटती है, जब राजा दशरथ ने शिकार के दौरान उसे मार दिया। दशरथ को यह नहीं पता था कि वह श्रवणकुमार को मार रहा है, और यह घटना उसके लिए एक बड़ा दुखद मोड़ बन जाती है।
श्रवणकुमार का मृत्यु के बाद शाप: श्रवणकुमार की मृत्यु के बाद उसके माता-पिता राजा दशरथ से शाप देते हैं कि जैसे उनका पुत्र वनवास चला गया, वैसे ही राजा दशरथ के पुत्र राम को भी वनवास जाना होगा। यह घटना कथा में एक महत्वपूर्ण मोड़ है।
राजा दशरथ का शोक: श्रवणकुमार की मृत्यु के बाद राजा दशरथ अत्यधिक शोक में डूब जाते हैं। वह अपने किए गए कार्य पर पछताते हैं और उसके परिणामस्वरूप राम को वनवास भेजने का निर्णय लेते हैं। यह घटनाएँ दशरथ के जीवन को शोक और पाप से भर देती हैं।
काव्य में इन घटनाओं के माध्यम से परिवार, कर्तव्य, और भाग्य के जटिल संबंधों को दर्शाया गया है। Quick Tip: 'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य में समर्पण, कर्तव्य और शोक की भावनाओं को बड़े ही संवेदनशील तरीके से चित्रित किया गया है, जो जीवन के कठोर सत्य को उजागर करता है।
7.(घ) 'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए।
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'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
राष्ट्रप्रेम और स्वतंत्रता संग्राम: 'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य में राष्ट्रप्रेम और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के महत्व को प्रमुखता से चित्रित किया गया है। यह काव्य भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष और इसके नायक के समर्पण को दर्शाता है।
महात्मा गाँधी का नेतृत्व: इस काव्य में महात्मा गाँधी के नेतृत्व की विशेषताएँ और उनके अहिंसा के सिद्धांत को अत्यधिक महत्व दिया गया है। गाँधी जी के सत्याग्रह, असहमति को सहने की शक्ति, और अहिंसा के विचार इस काव्य के केंद्रीय तत्व हैं।
स्वतंत्रता की प्राप्ति के संघर्ष: काव्य में भारत के स्वतंत्रता संग्राम के कठिन दिनों और संघर्षों का चित्रण किया गया है। यहाँ पर राजनीतिक, सामाजिक, और मानसिक संघर्षों को व्यक्त किया गया है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण: 'मुक्तियज्ञ' में आध्यात्मिकता का भी बड़ा स्थान है, जहाँ यह दिखाया गया है कि स्वतंत्रता की प्राप्ति केवल बाहरी संघर्ष नहीं, बल्कि एक आंतरिक मुक्ति और जागरूकता का भी विषय है।
नैतिक बलिदान: काव्य में महात्मा गाँधी और उनके अनुयायियों द्वारा किए गए नैतिक बलिदान को प्रमुखता से दर्शाया गया है। यह बलिदान केवल बाहरी संघर्षों के नहीं, बल्कि आत्मबलिदान के रूप में भी प्रस्तुत किया गया है।
काव्य के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम के ऐतिहासिक और नैतिक पहलुओं को बड़ी सूक्ष्मता से व्यक्त किया गया है। Quick Tip: 'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य में केवल बाहरी संघर्ष नहीं, बल्कि आत्म-संघर्ष और आत्मबलिदान की भी गहरी समझ दिखाई जाती है, जो महात्मा गाँधी के जीवन दर्शन से जुड़ी है।
7.(घ) अथवा 'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य के आधार पर 'महात्मा गाँधी' का चरित्रांकन कीजिए।
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'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी का चरित्र अत्यंत प्रेरणादायक और संघर्षशील रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनका व्यक्तित्व एक महान नेता, समाज सुधारक, और स्वतंत्रता संग्राम के प्रेरणास्त्रोत के रूप में उभरता है।
अहिंसा और सत्य के प्रति समर्पण: गाँधी जी का चरित्र अहिंसा और सत्य के प्रति अडिग समर्पण को दर्शाता है। उनका विश्वास था कि असत्य और हिंसा के बिना कोई भी आंदोलन सफलता प्राप्त नहीं कर सकता।
नैतिक नेतृत्व: 'मुक्तियज्ञ' में गाँधी जी के नेतृत्व को नैतिक रूप से सशक्त दिखाया गया है। उनका नेतृत्व किसी भी प्रकार के भौतिक बल से नहीं, बल्कि अपने अनुयायियों के बीच सत्य और न्याय के प्रति विश्वास और आस्था से प्रेरित था।
सत्याग्रह और असहमति का सम्मान: गाँधी जी ने सत्याग्रह और असहमति का सम्मान करने का सिद्धांत अपनाया। उन्होंने राजनीतिक संघर्षों को अहिंसा के माध्यम से हल किया, और यह उनके सिद्धांतों का एक अभिन्न हिस्सा था।
व्यक्तिगत बलिदान: गाँधी जी का चरित्र व्यक्तिगत बलिदान का प्रतीक है। उन्होंने अपने जीवन में कई बार व्यक्तिगत सुख-चैन को त्यागकर राष्ट्र की भलाई के लिए संघर्ष किया।
समाज सुधारक: गाँधी जी ने केवल राजनीतिक स्वतंत्रता के लिए संघर्ष नहीं किया, बल्कि सामाजिक सुधारों के लिए भी आवाज़ उठाई। छुआछूत, महिलाओं के अधिकार और किसानों की स्थिति को बेहतर बनाने के लिए उन्होंने अनेक प्रयास किए।
गाँधी जी का यह चरित्र न केवल राष्ट्रीय, बल्कि वैश्विक दृष्टिकोण से भी एक आदर्श प्रस्तुत करता है। उनका जीवन यह दर्शाता है कि आंतरिक सत्य और न्याय के बल पर कोई भी व्यक्ति बड़ा कार्य कर सकता है। Quick Tip: 'मुक्तियज्ञ' में महात्मा गाँधी का चरित्र विशेष रूप से उनके अद्भुत नेतृत्व, सत्य और अहिंसा के प्रति अडिग विश्वास, और आत्मबलिदान के रूप में उभरा है।
7(ङ) 'सत्य की जीत' खण्डकाव्य के आधार पर 'द्रौपदी' की चारित्रिक विशेषताएँ लिखिए।
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'सत्य की जीत' खण्डकाव्य में द्रौपदी का चरित्र अत्यधिक मजबूत और प्रेरणादायक रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनके व्यक्तित्व की प्रमुख चारित्रिक विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
धैर्य और साहस: द्रौपदी का जीवन कठिनाइयों और अपमानों से भरा हुआ था, फिर भी उन्होंने कभी अपनी शक्ति और साहस को नहीं खोया। महाभारत के कौरव सभा में उनके साथ जो घटित हुआ, उससे द्रौपदी का साहस और धैर्य स्पष्ट रूप से दिखाई देता है।
न्यायप्रियता: द्रौपदी के व्यक्तित्व में न्याय के प्रति गहरी आस्था थी। उन्होंने हर परिस्थिति में सत्य और न्याय के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया। यह उनके चरित्र का एक महत्वपूर्ण पहलू था, जो उनके जीवन के हर पहलू में दिखाई देता है।
स्वाभिमान: द्रौपदी का स्वाभिमान उनका प्रमुख गुण था। वे कभी भी अपने स्वाभिमान से समझौता नहीं करतीं। उनके अपमान के बाद भी उन्होंने न केवल अपनी मर्यादा को बनाए रखा, बल्कि दूसरों को भी न्याय की ओर प्रेरित किया।
सामाजिक दृष्टिकोण: द्रौपदी का चरित्र समाज के प्रति जागरूक था। उन्होंने न केवल अपने व्यक्तिगत कष्टों के लिए बल्कि समाज के लिए भी अपनी आवाज़ उठाई। उनका दृष्टिकोण न केवल स्वयं के लिए, बल्कि पूरे समाज के कल्याण के लिए था।
द्रुत निर्णय लेने की क्षमता: द्रौपदी के चरित्र में एक विशेष गुण यह था कि वे हर परिस्थिति में त्वरित निर्णय ले सकती थीं। उनकी यह क्षमता उन्हें एक कुशल और प्रभावी नेता बनाती है, जो हर समय सही निर्णय लेती है।
'सत्य की जीत' में द्रौपदी का यह चरित्र सत्य, साहस, और न्याय के लिए संघर्ष करने का प्रतीक है। उनके गुणों ने उन्हें एक महान महिला पात्र बना दिया। Quick Tip: द्रौपदी का चरित्र न केवल महिलाओं के अधिकार और स्वाभिमान का प्रतीक है, बल्कि उनके संघर्ष ने समाज में सशक्त बदलाव की नींव रखी।
7(ङ) अथवा 'सत्य की जीत' खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए।
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'सत्य की जीत' खण्डकाव्य की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
सत्य और न्याय का प्रमुख स्थान: 'सत्य की जीत' में सत्य और न्याय को प्रधानता दी गई है। काव्य के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि सत्य के मार्ग पर चलने से ही अंततः विजय प्राप्त होती है, भले ही रास्ता कठिन क्यों न हो।
धैर्य और साहस का संचार: खण्डकाव्य में जीवन की कठिन परिस्थितियों का सामना करने के लिए धैर्य और साहस को विशेष रूप से दर्शाया गया है। महाभारत की घटनाओं और उनके पात्रों के माध्यम से यह सिद्ध किया गया है कि अंततः सत्य की विजय होती है।
मनोबल और आस्था: काव्य में मनोबल और आस्था की महत्वपूर्ण भूमिका है। पात्रों का यह विश्वास कि सत्य हमेशा विजयी होता है, उन्हें अपने संघर्षों में जीत दिलाता है।
महत्वपूर्ण पात्रों का चित्रण: 'सत्य की जीत' खण्डकाव्य में द्रौपदी, युधिष्ठिर, अर्जुन और भगवान श्री कृष्ण जैसे प्रमुख पात्रों का गहरे और प्रभावशाली चित्रण किया गया है। इनके द्वारा दर्शाए गए मूल्य और गुण पाठकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनते हैं।
धार्मिक और नैतिक संदेश: काव्य के माध्यम से धार्मिक और नैतिक शिक्षा का प्रचार किया गया है। यह पाठकों को जीवन के सही मार्ग पर चलने और सत्य का अनुसरण करने के लिए प्रेरित करता है।
'सत्य की जीत' खण्डकाव्य न केवल एक साहित्यिक रचना है, बल्कि यह जीवन के मूल्यों, सत्य, और न्याय की गहरी शिक्षा प्रदान करती है। Quick Tip: 'सत्य की जीत' खण्डकाव्य में सत्य की शक्ति और उसके जीतने की अनिवार्यता को समझने के लिए इसके पात्रों के संघर्ष और उनके सिद्धांतों को जानना आवश्यक है।
7.(च) 'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य के आधार पर 'महात्मा गाँधी' का चरित्र चित्रण कीजिए।
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'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी का चरित्र अत्यधिक प्रेरणादायक और महान विचारों से भरा हुआ है। उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:
सत्य और अहिंसा का पालन: गाँधी जी का जीवन सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों पर आधारित था। उन्होंने अपने जीवन को इन दो आदर्शों से अभिप्रेरित किया और इन्हें भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में प्रमुख स्थान दिया। उनके लिए सत्य का मार्ग ही सबसे उचित था।
धैर्य और संघर्ष: गाँधी जी ने हमेशा धैर्य और शांतिपूर्ण संघर्ष को प्राथमिकता दी। उनका विश्वास था कि अहिंसक तरीके से संघर्ष करने से समाज में स्थायी बदलाव लाया जा सकता है।
स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता: महात्मा गाँधी का जीवन स्वावलंबन का प्रतीक था। उन्होंने अपने देशवासियों से खादी पहनने और आत्मनिर्भर बनने की अपील की। उनका यह संदेश आज भी समाज में प्रासंगिक है।
साधारण जीवन, उच्च विचार: महात्मा गाँधी का जीवन सादगी से भरा हुआ था। उन्होंने जीवन में भौतिक सुखों की बजाय आत्मिक सुख को प्राथमिकता दी और हमेशा उच्च विचारों का पालन किया।
समाज सुधारक: गाँधी जी ने समाज में व्याप्त कुरीतियों जैसे छुआछूत, बाल विवाह और अन्य सामाजिक समस्याओं के खिलाफ संघर्ष किया। उनका उद्देश्य समाज में समानता और न्याय स्थापित करना था।
महात्मा गाँधी का व्यक्तित्व भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरणास्त्रोत था और उनका आदर्श आज भी समृद्ध समाज की नींव है। Quick Tip: महात्मा गाँधी के विचारों में अहिंसा और सत्य के सिद्धांतों का गहरा प्रभाव था। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि बिना हिंसा के भी बड़े से बड़े संघर्ष को जीता जा सकता है।
7.(च) अथवा 'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का वर्णन कीजिए।
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'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य में महात्मा गाँधी के जीवन और उनके संघर्षों के प्रमुख क्षणों का विस्तृत वर्णन किया गया है। इसके कुछ प्रमुख घटनाएँ निम्नलिखित हैं:
दांडी मार्च: दांडी मार्च महात्मा गाँधी का एक प्रमुख सत्याग्रह था, जिसमें उन्होंने नमक कानून का विरोध किया और ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन को गति दी। इस घटना ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी।
नमक सत्याग्रह: गाँधी जी ने ब्रिटिश शासन के द्वारा लगाए गए नमक कर के खिलाफ संघर्ष किया। यह घटना भारतीय जनता को एकजुट करने और स्वतंत्रता संग्राम में सक्रिय रूप से भाग लेने के लिए प्रेरित करने वाली थी।
चम्पारण सत्याग्रह: यह गाँधी जी का पहला महत्वपूर्ण सत्याग्रह था, जिसमें उन्होंने किसानों के अधिकारों के लिए संघर्ष किया और उनके शोषण के खिलाफ आवाज़ उठाई। इस सत्याग्रह ने गाँधी जी को भारतीय समाज में एक नेता के रूप में स्थापित किया।
ख़िलाफ़त आंदोलन: गाँधी जी ने ख़िलाफ़त आंदोलन में भी भाग लिया, जो भारतीय मुसलमानों के अधिकारों के लिए था। इस आंदोलन ने हिन्दू-मुसलमान एकता को बढ़ावा दिया और भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एकजुट किया।
स्वदेशी आंदोलन: गाँधी जी ने स्वदेशी वस्त्रों को अपनाने और विदेशी वस्त्रों का बहिष्कार करने का आह्वान किया। इस आंदोलन ने भारतीयों में स्वावलंबन की भावना पैदा की और भारतीय उद्योगों को बढ़ावा दिया।
'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य की घटनाएँ महात्मा गाँधी के संघर्ष और उनके दृष्टिकोण के महत्वपूर्ण क्षणों को दर्शाती हैं, जिन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी। Quick Tip: 'आलोकवृत्त' में महात्मा गाँधी के जीवन की घटनाओं को पढ़कर हम यह समझ सकते हैं कि उनके संघर्षों ने भारत की स्वतंत्रता में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
8.(क) निम्नलिखित संस्कृत गद्यांशों में से किसी एक का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
संस्कृतस्य साहित्यं सरसं, व्याकरणञ्च सुनिश्चितम् । तस्य गद्ये पद्ये च लालित्यं, भावबोधसामर्थ्यम्, । अद्वितीयं श्रुतिमाधुर्यञ्च वर्तते । किं बहुना चरित्रनिर्माणार्थं यादृशी सत्प्रेरणां संस्कृतवाङ्मयं ददाति न तादृशीं किञ्चिदन्यत् । मूलभूतानां मानवीयगुणानां यादृशी विवेचना अन्ये संस्कृतसाहित्ये वर्तते, नान्यत्र तादृशी । दया, दानं शौचम्, औदार्यम्, अनसूया, क्षमा, चानेके गुणाः अस्य साहित्यस्य अनुशीलेन सञ्जायन्ते ।
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संस्कृत साहित्य अत्यंत सरस और सुनिश्चित व्याकरण से परिपूर्ण है। इसके गद्य और पद्य दोनों में लालित्य, भावबोध की सामर्थ्य, अद्वितीय श्रुतिमाधुर्य विद्यमान हैं। विशेष रूप से, संस्कृत साहित्य चरित्र निर्माण के लिए विशेष प्रेरणा प्रदान करता है, जो अन्यत्र कहीं उपलब्ध नहीं है। यह साहित्य मानव गुणों का गहरे विवेचन के साथ वर्णन करता है, जैसे दया, दान, शौच, उदारता, अनसूया, क्षमा आदि। इन गुणों का अभ्यास करने से व्यक्ति में इन गुणों का समावेश होता है और यह उसे एक आदर्श मनुष्य बनने की दिशा में मार्गदर्शन करता है। संस्कृत साहित्य मानवता के उच्चतम मानवीय गुणों को उजागर करता है और समाज में नैतिकता, दया और शुद्धता की भावना का प्रसार करता है। Quick Tip: संस्कृत साहित्य में निहित मानवीय गुणों को समझकर हम अपने जीवन में शुद्धता, दया, और उदारता जैसे गुणों को अंगीकार कर सकते हैं।
8.(क) अथवा गुरुणा एवम् आज्ञप्तः महर्षिदयानन्दः एतद्देशवासिनो जनान् उद्धर्तुं कर्मक्षेत्रेऽवतारत् । सर्वप्रथमं हरिद्वारे कुम्भपर्वणि भागीरथीतटे पाखण्डखण्डिनीं पताकामस्थापयत् । ततश्च हिमाद्रिं गत्वा त्री वर्षाणि तपः अतप्यत । तदनन्तरमयं प्रतिपादितवान् ऋग्यजुस्सामाथर्वाणो वेदा नित्या ईश्वरकर्तृकाश्च ब्राह्मण-क्षत्रिय वैश्य शूद्राणां गुणकर्मस्वभावैः विभाग: न तु जन्मना, चत्वार एव आश्रमाः, ईश्वरः एक एव ब्रह्म-पितृ देवातिथि - बलि - वैश्वदेवाः पञ्च महायज्ञा: नित्यं करणीयाः । 'स्त्रीशूद्रौ वेदं नाधीयाताम् अस्य वाक्यस्य असारतां प्रतिपाद्य सर्वेषां वेदाध्ययनाधिकारं व्यवस्थापयत् ।
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महर्षि दयानन्द ने भारतीय समाज को सुधारने के लिए अपनी शिक्षाओं और उपदेशों से एक नई दिशा दी। सबसे पहले, हरिद्वार में कुम्भ मेला के दौरान उन्होंने पाखंड और अंधविश्वास के खिलाफ एक पताका स्थापित की। इसके बाद, उन्होंने हिमालय पर्वत पर तीन वर्षों तक कठोर तपस्या की। इसके पश्चात, वेदों के सत्य का प्रचार करते हुए उन्होंने यह सिद्धांत प्रस्तुत किया कि वेद हमेशा नित्य हैं और भगवान के द्वारा रचित हैं। उन्होंने चारों वर्णों—ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, और शूद्र—को उनके गुण, कर्म और स्वभाव के आधार पर विभाजित किया, न कि जन्म के आधार पर। वे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्रों के बीच भेदभाव के खिलाफ थे और उन्होंने यह स्पष्ट किया कि सभी को वेद अध्ययन का अधिकार है। इसके अलावा, महर्षि दयानन्द ने यह भी कहा कि स्त्री और शूद्रों को वेद नहीं पढ़ने चाहिए—इसका उद्देश्य केवल यह था कि समाज में सभी को समान अधिकार और अवसर मिले। Quick Tip: महर्षि दयानन्द का योगदान समाज के विभिन्न वर्गों के बीच समानता और वेदों के ज्ञान के प्रसार को बढ़ावा देना था। उनके सिद्धांत आज भी भारतीय समाज में महत्वपूर्ण हैं।
8. (ख) निम्नलिखित संस्कृत पद्यांशों में से किसी एक का सन्दर्भ सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए :
ज्ञाने मौनं क्षमा शक्तौ त्यागे श्लाघाविपर्ययः ।
गुणागुणानुबन्धित्वात् तस्य सप्रसवा इव ।।
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यह श्लोक गुणों के परस्पर संबंध और उनकी महानता पर आधारित है। श्लोक का अर्थ है:
"ज्ञान, मौन, क्षमा, शक्ति, त्याग और श्लाघा ये सभी गुण आपस में जुड़े हुए हैं। इन गुणों का एकत्र होना तभी संभव है, जब ये एक-दूसरे के साथ सामंजस्यपूर्ण तरीके से जुड़े हों। जैसे कि माता के गर्भ में बच्चा अपने गुणों को एकत्र करता है, वैसे ही ये गुण एक साथ जुड़कर अपना पूरा प्रभाव दिखाते हैं।"
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि जीवन में विभिन्न गुणों का संतुलित रूप से पालन करना आवश्यक है, जिससे व्यक्ति की शुद्धता और संतुलन में वृद्धि होती है। Quick Tip: यह श्लोक गुणों के परस्पर संबंध की महिमा का उल्लेख करता है, और हमें यह सिखाता है कि गुणों का एकत्रित प्रभाव ही व्यक्ति के जीवन को पूर्ण और संतुलित बनाता है।
8. (ख) अथवा न चौरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारि ।
व्यये कृते वर्द्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनं प्रधानम् ।।
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यह श्लोक शिक्षा के महत्व और उसके अमूल्य होने पर आधारित है। श्लोक का अर्थ है:
"जो धन चोरों से नहीं लिया जा सकता, जो राजा से नहीं छीना जा सकता, जो भाई के हिस्से में नहीं आता, और जो बोझ की तरह नहीं लगता, वही धन 'विद्याधन' है। यह धन खर्च करने पर बढ़ता रहता है और यह सर्वश्रेष्ठ धन है।"
यह श्लोक हमें यह सिखाता है कि ज्ञान और शिक्षा वह सबसे बड़ा संपत्ति है, जो न तो कोई चुराने सकता है, न कोई छीन सकता है, और यह हमेशा बढ़ती रहती है। शिक्षा का लाभ हमेशा जारी रहता है और व्यक्ति को जीवन में वास्तविक समृद्धि और संतोष प्रदान करता है। Quick Tip: यह श्लोक शिक्षा के महत्व को उजागर करता है, जो एक स्थायी संपत्ति है, जो न केवल मानसिक विकास में मदद करती है, बल्कि जीवन के हर क्षेत्र में सफलता की कुंजी भी है।
9. निम्नलिखित में से किन्हीं दो प्रश्नों के उत्तर संस्कृत में दीजिए:
(क) कात्यायनी कस्य पत्नी आसीत् ?
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कात्यायनी राजा कृतवर्मा की पत्नी आसीत्। वह एक महान यज्ञ में भाग लेने वाली तपस्विनी और तपस्या के द्वारा शक्तिशाली व ज्ञानी हुई थीं। कात्यायनी ने दैवीय शक्ति प्राप्त करने के लिए भगवान शिव की आराधना की थी और वह उनके द्वारा दी गई शक्ति से सम्मानित हुईं। Quick Tip: कात्यायनी को देवी के रूप में पूजा जाता है और उनके नाम पर कई स्थानों में पूजन होता है।
9.(ख) हंसराज : स्वदुहितरं कस्मै अददात् ?
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हंसराज ने अपनी स्वदुहितरं राजा को अददात्। स्वदुहितरं, राजा के लिए एक सशक्त और सम्मानित उपहार के रूप में यह विशेष प्रतीक था। हंसराज ने राजा की शक्ति और सम्मान की रक्षा के लिए इस उपहार को दिया, ताकि राज्य की स्थिरता और अधिकारिता बनी रहे। Quick Tip: हंसराज की भूमिका में साहस और बलिदान की महत्वपूर्ण विशेषताएँ थीं, जो उन्होंने अपने राज्य की भलाई के लिए निभाई।
9. (ग) हिन्दूविश्वविद्यालयस्य संस्थापकः कः आसीत् ?
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हिन्दू विश्वविद्यालयस्य संस्थापकः पं. मदन मोहन मालवीय आसीत्। ते भारतीय समाज के प्रतिष्ठित नेता और शिक्षाशास्त्री थे। मालवीय जी ने भारतीय संस्कृति, शिक्षा और समाज सुधार के लिए अनेक कार्य किए थे और उन्होंने ही वाराणसी में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना की थी। Quick Tip: पं. मदन मोहन मालवीय जी ने भारतीय शिक्षा में सुधार और भारत की सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण हेतु महत्वपूर्ण योगदान दिया।
9. (घ) बुद्धस्य पञ्चशीलसिद्धान्ता: के सन्ति ?
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बुद्धस्य पञ्चशीलसिद्धान्ता: निम्नलिखित सन्ति:
अहिंसा: किसी भी जीव के प्रति हिंसा का त्याग करें।
सत्यं: हमेशा सत्य बोलें।
अस्तेय: चोरी न करें और दूसरों की संपत्ति का सम्मान करें।
ब्रह्मचर्य: संयम और शुद्ध जीवन जीएं।
अपारिग्रह: किसी भी प्रकार की वस्तु का अतिक्रमण न करें और इच्छाओं से दूर रहें।
ये सिद्धान्त व्यक्ति को शुद्धता, सत्यता और अहिंसा की दिशा में मार्गदर्शन करते हैं और समाज के कल्याण हेतु महत्वपूर्ण हैं। Quick Tip: बुद्ध के पञ्चशील सिद्धान्त व्यक्ति की मानसिक और नैतिक शुद्धता को प्रोत्साहित करते हैं और जीवन को सरल व सच्चे मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते हैं।
10.(क) 'संयोग श्रृंगार' अथवा 'करुण रस की परिभाषा लिखकर एक उदाहरण दीजिए।'
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संयोग श्रृंगार वह रस है, जो प्रेमी और प्रेमिका के मिलन के अवसर पर प्रकट होता है। इसमें प्रेम और मिलन के आनंद, उल्लास, और सुख की भावना होती है। यह रस विशेष रूप से प्रेम के संयोग (मिलन) और उसके परिणति को व्यक्त करता है।
उदाहरण:
"राधा और कृष्ण का मिलन, जहां वे एक-दूसरे के साथ प्रेमपूर्ण समय बिताते हैं, यह संयोग श्रृंगार का उदाहरण है।"
लक्षण:
संयोग श्रृंगार में प्रेमी और प्रेमिका के बीच के प्रेमपूर्ण संबंधों, मिलन की परिस्थितियों और आनंदपूर्ण भावनाओं की अभिव्यक्ति होती है। यह रस विशेष रूप से सुख और प्रेम की भावनाओं को उत्तेजित करता है। Quick Tip: संयोग श्रृंगार में प्रेम और मिलन की भावनाएँ प्रमुख होती हैं, जो प्रेमी और प्रेमिका के बीच के आनंदपूर्ण संबंधों को व्यक्त करती हैं।
10.(ख) 'रूपक' अथवा 'अनन्वय' अलंकार की परिभाषा लिखकर एक उदाहरण दीजिए।'
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रूपक अलंकार वह अलंकार है, जिसमें एक वस्तु को दूसरी वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, ताकि उसकी विशेषता को और अधिक प्रभावशाली तरीके से व्यक्त किया जा सके। इस अलंकार में तुलना का प्रयोग नहीं किया जाता, बल्कि किसी एक वस्तु को दूसरी वस्तु की तरह प्रस्तुत किया जाता है।
उदाहरण:
"वह शेर की तरह शूर है।"
यहां व्यक्ति को शेर के समान वीर बताया गया है, जिससे उसकी वीरता को अधिक प्रभावी रूप से व्यक्त किया गया है।
लक्षण:
रूपक अलंकार में तुलना की आवश्यकता नहीं होती; किसी वस्तु को दूसरी वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, ताकि उसकी विशेषता अधिक स्पष्ट हो। Quick Tip: रूपक अलंकार में किसी वस्तु को दूसरी वस्तु के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, जिससे उसकी विशेषता और प्रभाव को बढ़ाया जाता है।
10.(ग) 'चौपाई' अथवा 'हरिगीतिका' छन्द की सोदाहरण परिभाषा लिखिए।'
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चौपाई एक लोकप्रिय हिंदी काव्य छन्द है, जिसका प्रयोग विशेष रूप से रामायण में किया गया है। इस छन्द में प्रत्येक पंक्ति में 16 मात्राएँ होती हैं और यह चार पंक्तियों में व्यवस्थित होती है। यह छन्द भक्ति काव्य में विशेष रूप से प्रचलित है।
उदाहरण:
"राम जी के चरणों में बसा सुख, चरण में राम का अनुराग।"
यह छन्द चौपाई का उदाहरण है, जिसमें प्रत्येक पंक्ति में 16 मात्राएँ हैं और चार पंक्तियों का यह छन्द राम की भक्ति को व्यक्त करता है।
लक्षण:
चौपाई छन्द में चार पंक्तियाँ होती हैं और प्रत्येक पंक्ति में 16 मात्राएँ होती हैं। यह छन्द भक्ति, प्रेम और अन्य आध्यात्मिक भावनाओं के लिए उपयुक्त है। Quick Tip: चौपाई में चार पंक्तियाँ होती हैं, प्रत्येक पंक्ति में 16 मात्राएँ होती हैं, और यह भक्ति काव्य में विशेष रूप से प्रयोग होता है।
Question 11: निम्नलिखित में से किसी एक विषय पर निबन्ध लिखिए:
11. (क) भविष्य निर्माण में विद्यार्थी जीवन का महत्त्व
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विद्यार्थी जीवन जीवन का सबसे महत्वपूर्ण चरण है, जिसमें हमारे भविष्य का निर्माण होता है। यह वह समय है जब हम अपनी शिक्षा, आदतें और जीवन के मूल्यों का निर्माण करते हैं। विद्यार्थी जीवन के दौरान किए गए कार्य, अध्ययन, निर्णय और उद्देश्य जीवनभर के लिए हमारी दिशा निर्धारित करते हैं। यह एक ऐसा समय है जब हम जीवन के उद्देश्य, लक्ष्यों और सामाजिक जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक होते हैं।
शिक्षा और ज्ञान:
विद्यार्थी जीवन में शिक्षा का महत्त्व सर्वोपरि है। शिक्षा केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह जीवन के हर पहलु को समझने, सामाजिक और नैतिक जिम्मेदारियों को निभाने का एक तरीका है। अध्ययन से न केवल हमारे ज्ञान का विकास होता है, बल्कि यह हमें आलोचनात्मक सोच और समस्याओं के समाधान में मदद करता है।
अनुशासन और समय प्रबंधन:
विद्यार्थी जीवन में अनुशासन और समय प्रबंधन का विशेष महत्त्व है। जब हम विद्यार्थी होते हैं, तो यह समय होता है जब हमें सही आदतें विकसित करनी होती हैं। नियमित अध्ययन, समर्पण, और समय का सही उपयोग हमें सफलता की ओर अग्रसर करता है। यह आदतें भविष्य में कार्य, परिवार और समाज में योगदान देने के लिए सहायक होती हैं।
समाज और संस्कृति:
विद्यार्थी जीवन में समाज के प्रति जागरूकता भी बढ़ाई जाती है। विद्यार्थियों को समाज की समस्याओं, जलवायु परिवर्तन, महिला सशक्तिकरण, और अन्य सामाजिक मुद्दों के बारे में जागरूक किया जाता है। इस समय पर समाजिक कार्य, सामाजिक जिम्मेदारी, और नागरिक कर्तव्यों को समझने के लिए यह सबसे उपयुक्त समय है।
समस्याओं का समाधान:
विद्यार्थी जीवन में हमें बहुत सी समस्याओं का सामना करना पड़ता है, जैसे तनाव, असफलता, और सामाजिक दबाव। इन समस्याओं से निपटने की कला विद्यार्थी जीवन में ही सीखी जाती है। यह समय हमें आत्मविश्वास, साहस और आत्मनिर्भरता के गुणों को विकसित करने का अवसर देता है।
निष्कर्ष:
विद्यार्थी जीवन हमारे भविष्य के निर्माण के लिए एक मजबूत आधार प्रदान करता है। अगर हम इस समय का सही तरीके से उपयोग करते हैं, तो यह हमें जीवनभर सफलता और संतोष की ओर अग्रसर कर सकता है। यह समय केवल अध्ययन और परीक्षा के लिए नहीं होता, बल्कि यह हमारे व्यक्तित्व और जीवन के उद्देश्य का निर्माण करने के लिए महत्वपूर्ण है। Quick Tip: विद्यार्थी जीवन में परिश्रम और अनुशासन से ही हम अपने भविष्य का निर्माण कर सकते हैं। यही समय है जब हम अपने जीवन के मूल्यों और आदर्शों को स्थिर करते हैं।
11.(ख) दहेज प्रथा एक अभिशाप
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दहेज प्रथा भारतीय समाज में एक जटिल और गंभीर सामाजिक समस्या बन चुकी है। यह प्रथा विवाह के समय एक पक्ष द्वारा दूसरे पक्ष से संपत्ति, धन या अन्य भौतिक वस्तुएं प्राप्त करने की परंपरा है। हालांकि, इस प्रथा का उद्देश्य शुरुआत में सामाजिक सुरक्षा और विवाह के समय विवाहिता को समर्थन प्रदान करना था, लेकिन समय के साथ यह एक बाध्यता और व्यापारिक गतिविधि में बदल गई। यह न केवल सामाजिक असमानता को बढ़ावा देती है, बल्कि महिलाओं के शोषण का कारण भी बनती है।
दहेज का इतिहास और उत्पत्ति:
दहेज की प्रथा का इतिहास बहुत पुराना है। पहले यह दान के रूप में था, जिसे एक लड़की के परिवार की तरफ से उसकी शादी के समय दिया जाता था। यह उसे नए घर में उसकी स्थिति और सुरक्षा की गारंटी देने के लिए था। लेकिन समय के साथ यह एक अनिवार्य मांग बन गई, और एक प्रकार का आर्थिक बोझ बन गई जो विवाह की सफलता के साथ जुड़ने लगा।
समाज पर प्रभाव:
दहेज प्रथा का सबसे बड़ा प्रभाव समाज में महिलाओं की स्थिति पर पड़ा है। यह महिलाओं को एक वस्तु के रूप में देखता है, जिसे बेचने और खरीदने की बात की जाती है। इस प्रथा के कारण महिलाओं के प्रति हिंसा, अपमान और शारीरिक शोषण में वृद्धि हुई है। दहेज के कारण कई महिलाओं की आत्महत्या और हत्या तक हो चुकी है।
कानूनी पहल:
भारत सरकार ने दहेज प्रथा के खिलाफ कई कड़े कानून बनाए हैं, जैसे दहेज निषेध अधिनियम, 1961, और भारतीय दंड संहिता की धारा 498A, जो दहेज उत्पीड़न से संबंधित है। बावजूद इसके, दहेज प्रथा का उन्मूलन एक जटिल कार्य है क्योंकि यह प्रथा सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से गहरे स्तर पर समाहित हो चुकी है।
समाधान:
इस प्रथा को समाप्त करने के लिए समाज में व्यापक जागरूकता की आवश्यकता है। शिक्षा, कानून और सामाजिक बदलाव की जरूरत है ताकि लोग समझ सकें कि यह प्रथा न केवल महिलाओं के अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि यह समाज की प्रगति में भी एक बाधा है।
निष्कर्ष:
दहेज प्रथा एक अभिशाप है जो समाज को नुकसान पहुँचाती है। इसे समाप्त करने के लिए हर व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी। हमें इस प्रथा के खिलाफ जागरूकता फैलानी होगी और महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करनी होगी। Quick Tip: दहेज प्रथा को समाप्त करने के लिए हमें समाज में जागरूकता फैलानी होगी और कानून का पालन करना अत्यंत आवश्यक है। महिलाओं के अधिकारों को समान रूप से मान्यता देना समाज की जिम्मेदारी है।
11.(ग) गोस्वामी तुलसीदास की प्रासंगिकता
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गोस्वामी तुलसीदास भारतीय साहित्य के महान कवि, संत और धार्मिक विचारक थे। उनका योगदान न केवल भारतीय साहित्य में, बल्कि भारतीय समाज और संस्कृति में भी अत्यधिक महत्वपूर्ण है। उनकी रचनाएँ आज भी समाज में प्रासंगिक हैं और उन्हें व्यापक रूप से पूजा और सम्मान प्राप्त है। तुलसीदास ने न केवल धार्मिक और धार्मिक ग्रंथों की रचनाएँ कीं, बल्कि समाज के हर वर्ग के लिए जीवन के आदर्श प्रस्तुत किए।
रामचरितमानस और भक्ति आंदोलन:
तुलसीदास की सबसे प्रसिद्ध रचना 'रामचरितमानस' है, जो भगवान राम के जीवन और उनके आदर्शों को प्रस्तुत करती है। यह काव्य ग्रंथ भक्ति आंदोलन का आधार बना और जनमानस में भक्ति और धार्मिकता के प्रति जागरूकता बढ़ाई। तुलसीदास ने राम के जीवन को आदर्श और प्रेरणा स्रोत के रूप में प्रस्तुत किया, जिससे समाज में सत्य, धर्म, और मर्यादा की समझ बढ़ी। रामचरितमानस ने भारतीय समाज में राम के प्रति भक्ति को न केवल मजबूत किया, बल्कि समाज के हर वर्ग में यह ग्रंथ समान रूप से प्रिय हो गया। यह ग्रंथ विशेष रूप से उन लोगों के लिए प्रेरणास्त्रोत बना जो भारतीय संस्कृति और जीवन के उच्च आदर्शों से अवगत नहीं थे।
तुलसीदास के रामचरितमानस ने न केवल हिंदू धर्म के अनुयायियों को धार्मिक दृष्टिकोण से समृद्ध किया, बल्कि उन्होंने भारतीय जनता को एकता और अखंडता का संदेश भी दिया। राम के आदर्शों को प्रस्तुत कर उन्होंने यह संदेश दिया कि एक व्यक्ति को किस तरह से अपने जीवन को धर्म, आदर्श, और सत्य के मार्ग पर चलकर सार्थक बनाना चाहिए।
धार्मिक एकता और सर्वधर्म समभाव:
गोस्वामी तुलसीदास ने अपने काव्य में हिंदू धर्म की धार्मिक और नैतिक शिक्षाओं को प्रचारित किया, लेकिन उन्होंने सभी वर्गों और समुदायों को एकत्र करने का प्रयास किया। उनके काव्य में सामाजिक एकता, प्रेम, और भाईचारे का संदेश था, जो आज भी समाज में प्रासंगिक है। तुलसीदास ने अपने लेखन में हिन्दू धर्म के साथ-साथ अन्य धर्मों को भी सम्मान दिया। उन्होंने 'राम के आदर्शों' को सार्वभौमिक मूल्य के रूप में प्रस्तुत किया, जिनसे न केवल हिन्दू समाज को बल्कि सम्पूर्ण समाज को लाभ हुआ।
इसके साथ ही, तुलसीदास ने यह भी समझाया कि जीवन में विभिन्न धर्मों और संस्कृतियों के लोगों को एक साथ मिलकर एक शांतिपूर्ण और सहिष्णु समाज की ओर अग्रसर होना चाहिए। उनके जीवन के संदेश में यह दिखाया गया कि बिना भेदभाव के, हर किसी को समान आदर्शों और मूल्यों का पालन करना चाहिए।
नैतिकता और जीवन के आदर्श:
तुलसीदास की रचनाएँ जीवन के हर पहलू पर गहरे विचार प्रदान करती हैं। उनका संदेश था कि हम अपने जीवन में सत्य, धर्म, और नैतिकता को सर्वोपरि रखें। उनका आदर्श यह था कि जीवन में सफलता, संतोष और शांति पाने के लिए हमें अपनी श्रद्धा और भक्ति को सही मार्ग पर लगाना चाहिए। उनकी रचनाओं में व्यक्त की गई शिक्षाएँ आज भी लोगों के जीवन को प्रभावित करती हैं और उनका मार्गदर्शन करती हैं। तुलसीदास के काव्य में नैतिक और सुसंस्कृत जीवन जीने की प्रेरणा मिलती है, जिससे व्यक्ति के व्यक्तित्व का निर्माण होता है।
उन्हें न केवल धार्मिक संदर्भों में बल्कि सामाजिक जीवन में भी एक आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया गया। उन्होंने बताया कि हर व्यक्ति को अपने कर्तव्यों का पालन करने, कठिनाइयों का सामना करने, और सत्य के मार्ग पर चलने की आवश्यकता है। इन सिद्धांतों से उनकी रचनाएँ आज भी हमारे जीवन में प्रासंगिक बनी रहती हैं।
सामाजिक समरसता और न्याय का संदेश:
तुलसीदास ने अपने काव्य में समाज में व्याप्त विभिन्न प्रकार की सामाजिक असमानताओं और अन्याय के खिलाफ आवाज उठाई। राम को हमेशा न्यायप्रिय, सत्यवादी और एक आदर्श राजा के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिससे यह संदेश गया कि समाज में हर व्यक्ति को समान अधिकार मिलना चाहिए और किसी के साथ भेदभाव नहीं होना चाहिए। उनका काव्य भारतीय समाज में सामाजिक न्याय की आवश्यकता को भी रेखांकित करता है, जो आज के संदर्भ में और भी प्रासंगिक है।
निष्कर्ष:
गोस्वामी तुलसीदास की रचनाएँ आज भी समाज में प्रासंगिक हैं क्योंकि उनकी शिक्षाएँ समय और परिस्थितियों से परे हैं। उनका जीवन और काव्य संदेश देते हैं कि हमें सत्य, धर्म और प्रेम के रास्ते पर चलना चाहिए, जिससे हम व्यक्तिगत और सामाजिक रूप से उन्नति कर सकें। उनका संदेश आज के समय में भी उतना ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि समाज में धार्मिक सहिष्णुता, नैतिकता, और समरसता की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महसूस हो रही है। तुलसीदास का आदर्श और उनका काव्य आज भी हमें समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को समझने और एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा देता है। Quick Tip: गोस्वामी तुलसीदास की रचनाओं में जीवन के नैतिक और धार्मिक सिद्धांतों की गहरी समझ है, जो समाज में प्रेम, समर्पण और एकता को बढ़ावा देती हैं। उनके विचार आज भी समाज में समरसता और भाईचारे के लिए प्रासंगिक हैं।
11. (घ) देशाटन से लाभ
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देशाटन, या यात्रा, न केवल शारीरिक यात्रा है, बल्कि यह मानसिक और सांस्कृतिक उन्नति का एक साधन भी है। भारतीय संस्कृति में यात्रा को एक पवित्र कार्य माना जाता है, जो व्यक्ति के आत्म-विकास और समाज के प्रति समझ को बढ़ाता है। देशाटन के अनेक लाभ होते हैं, जो व्यक्ति के जीवन को अधिक समृद्ध और उद्देश्यपूर्ण बनाते हैं।
ज्ञान और अनुभव में वृद्धि:
देशाटन का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह व्यक्ति के ज्ञान और अनुभव को बढ़ाता है। विभिन्न स्थानों पर जाकर व्यक्ति नई संस्कृतियों, रीति-रिवाजों, और जीवनशैली को समझता है। यह अनुभव केवल भौतिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक रूप से भी उन्नति प्रदान करता है। जब कोई व्यक्ति नई जगहों पर यात्रा करता है, तो उसे वहां के लोगों की सोच, रहन-सहन, और परंपराओं का गहरा अध्ययन करने का अवसर मिलता है। इससे वह अपनी सोच को विस्तारित करता है और दूसरे दृष्टिकोणों को समझने में सक्षम होता है।
सामाजिक जागरूकता और सहिष्णुता:
देशाटन से व्यक्ति में सामाजिक जागरूकता और सहिष्णुता बढ़ती है। जब हम विभिन्न क्षेत्रों में यात्रा करते हैं, तो हमें विभिन्न समाजों के बीच की विविधताएँ और समानताएँ समझ में आती हैं। यह अनुभव व्यक्ति को यह सिखाता है कि हर समाज की अपनी एक अलग पहचान और सोच होती है। इससे हम अपनी सीमाओं को पार करते हुए सहिष्णुता, समानता, और आपसी सम्मान का महत्व समझते हैं। साथ ही, यह हमें समाज में समरसता और सहिष्णुता को बढ़ावा देने का अवसर प्रदान करता है।
संस्कारों और संस्कृति का आदान-प्रदान:
देशाटन से व्यक्ति को विभिन्न संस्कृतियों, परंपराओं और विचारधाराओं के बारे में जानने का अवसर मिलता है। इससे वह अपनी संस्कृति और धरोहर के प्रति जागरूक होता है और साथ ही दूसरों की संस्कृति का भी सम्मान करता है। यात्रा से संस्कृति का आदान-प्रदान होता है, जो समाज को अधिक खुले और समृद्ध बनाता है। यह संस्कृति को जीवित रखने और उसे पीढ़ी दर पीढ़ी संप्रेषित करने में सहायक होता है।
स्वास्थ्य और ताजगी:
देशाटन व्यक्ति के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य के लिए भी फायदेमंद होता है। नए स्थानों पर यात्रा करने से व्यक्ति को मानसिक ताजगी मिलती है, क्योंकि यह एक तरह से रोजमर्रा की दिनचर्या से बाहर निकलने का अवसर होता है। जब हम नई जगहों की सैर करते हैं, तो हमें नए वातावरण, मौसम, और खाद्य पदार्थों का अनुभव होता है, जो शरीर और मन दोनों के लिए लाभकारी होते हैं। यह यात्रा तनाव को कम करती है और व्यक्ति को मानसिक शांति और ऊर्जा प्रदान करती है।
नए अवसर और करियर:
देशाटन से करियर और व्यक्तिगत विकास के नए अवसर खुल सकते हैं। यात्रा के दौरान व्यक्ति नए संपर्क बना सकता है, नए विचारों को समझ सकता है और व्यवसायिक संबंधों को मजबूत कर सकता है। विशेष रूप से व्यापारिक यात्रा और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में भाग लेने से करियर में वृद्धि के नए अवसर उत्पन्न होते हैं। इसके अलावा, यात्रा से व्यक्ति को अपने क्षेत्र में नई जानकारियाँ और तकनीकी जानकारी मिल सकती है, जो उसे अपने पेशे में उन्नति करने में मदद कर सकती है।
निष्कर्ष:
देशाटन का व्यक्ति के जीवन में अत्यधिक महत्व है। यह न केवल ज्ञान और अनुभव प्राप्त करने का एक साधन है, बल्कि यह व्यक्ति के मानसिक, शारीरिक और सामाजिक विकास में भी सहायक है। यात्रा से व्यक्ति के दृष्टिकोण में बदलाव आता है और वह दुनिया को एक नए दृष्टिकोण से देखता है। यह उसे न केवल अपने जीवन को संतुलित और समृद्ध बनाने का अवसर देता है, बल्कि समाज और संस्कृति को समझने की दिशा में भी सहायक होता है। Quick Tip: देशाटन से न केवल ज्ञान मिलता है, बल्कि यह मानसिक शांति और ताजगी का भी एक महत्वपूर्ण साधन है, जो जीवन को सकारात्मक दिशा में अग्रसर करता है।
11. (ङ) ग्राम्य विकास में मनरेगा की भूमिका
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महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) एक प्रमुख योजना है, जो भारतीय ग्रामीण क्षेत्र के विकास में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह योजना ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन और गरीबी उन्मूलन के उद्देश्य से शुरू की गई थी, और इसके अंतर्गत ग्रामीण परिवारों को रोजगार प्रदान किया जाता है। मनरेगा का उद्देश्य न केवल रोजगार प्रदान करना है, बल्कि इसके द्वारा ग्रामीण क्षेत्रों में अवसंरचना विकास भी सुनिश्चित करना है।
रोजगार सृजन:
मनरेगा योजना का सबसे बड़ा उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में स्थिर और दीर्घकालिक रोजगार प्रदान करना है। इस योजना के तहत, ग्रामीण परिवारों को 100 दिन का रोजगार सुनिश्चित किया जाता है, जो उन्हें वित्तीय रूप से समर्थ बनाता है। इस रोजगार के दौरान श्रमिकों को न्यूनतम मजदूरी दी जाती है, जिससे उनके जीवन स्तर में सुधार होता है और वे अपने परिवार की आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं।
ग्रामीण बुनियादी ढांचे का विकास:
मनरेगा न केवल रोजगार प्रदान करता है, बल्कि इस योजना के तहत ग्रामीण क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार के अवसंरचनात्मक कार्य भी किए जाते हैं। जैसे कि सड़क निर्माण, तालाबों की खुदाई, जल संरक्षण, वृक्षारोपण और नहरों की मरम्मत आदि। इन कार्यों से न केवल रोजगार मिलता है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे का भी विकास होता है। इससे खेती, जल संचयन, और पर्यावरण संरक्षण में भी मदद मिलती है।
महिला सशक्तिकरण:
मनरेगा योजना में महिलाओं को भी समान अवसर प्राप्त हैं। यह योजना विशेष रूप से महिलाओं को रोजगार प्रदान करने में मदद करती है, जिससे उन्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिलती है। महिलाओं के लिए 33% आरक्षण सुनिश्चित किया गया है, जिससे उन्हें श्रम बाजार में समान अवसर मिलता है। इससे ग्रामीण महिलाओं के जीवन में सकारात्मक बदलाव आता है, और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने में मदद मिलती है।
गरीबी उन्मूलन:
मनरेगा योजना का एक अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य गरीबी उन्मूलन है। जब ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को रोजगार मिलता है, तो उनकी आय में वृद्धि होती है, जिससे वे अपनी बुनियादी आवश्यकताओं को पूरा कर सकते हैं। इसके माध्यम से, ग्रामीण परिवारों की गरीबी कम होती है और उन्हें वित्तीय सुरक्षा मिलती है। यह योजना ग्रामीण क्षेत्र में स्थायित्व लाने में मदद करती है, जिससे लोगों का जीवन स्तर बेहतर होता है।
स्थिरता और आर्थिक विकास:
मनरेगा योजना का एक और लाभ यह है कि यह ग्रामीण क्षेत्रों की स्थिरता और आर्थिक विकास में योगदान करती है। जब ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार मिलता है, तो लोग अपनी भूमि पर काम करते हैं और अपनी स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं। इसके अलावा, मनरेगा के द्वारा किए गए विकास कार्यों से स्थानीय आधारभूत संरचनाओं में सुधार होता है, जिससे पूरे क्षेत्र का विकास होता है। इससे न केवल स्थानीय आर्थिक गतिविधियों में वृद्धि होती है, बल्कि पूरे देश की आर्थिक स्थिति में सुधार होता है।
निष्कर्ष:
मनरेगा योजना ने ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन, गरीबी उन्मूलन, महिला सशक्तिकरण और बुनियादी ढांचे के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। यह योजना ग्रामीण जीवन के स्तर को सुधारने के लिए एक स्थायी समाधान प्रदान करती है। इसके माध्यम से, ग्रामीण इलाकों में समृद्धि और विकास को बढ़ावा मिलता है। हालांकि, इस योजना में कई चुनौतियां भी हैं, जैसे कि कार्यों का प्रभावी ढंग से लागू होना, लेकिन इसके प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता। Quick Tip: मनरेगा योजना ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और बुनियादी ढांचे के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण उपाय है, जो गरीबी को कम करने में सहायक साबित हो रही है।
12.(क) (i) 'चयनम्' का सन्धि-विच्छेद है :
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'चयनम्' का सन्धि-विच्छेद इस प्रकार है: चय + नम्। 'चय' का अर्थ होता है 'चयन' या 'चुनना' और 'नम्' प्रत्यय है, जिसका अर्थ होता है 'प्रकार' या 'क्रिया'। Quick Tip: सन्धि-विच्छेद करते समय प्रत्यय और मूल धातु के बीच का संबंध समझना जरूरी है।
12.(क) (ii) 'निश्छलः' का सन्धि-विच्छेद है :
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'निश्छलः' का सन्धि-विच्छेद इस प्रकार है: निश् + छलः। 'निश्' का अर्थ होता है 'निश्चल' या 'स्थिर' और 'छलः' का अर्थ होता है 'ठगना' या 'धोखा'। यहाँ पर 'निश्छल' का अर्थ 'जो स्थिर और धोखा नहीं देता' है। Quick Tip: सन्धि-विच्छेद करते समय दोनों शब्दों का अर्थ और संयोजन समझना अहम होता है।
12.(क) (iii) 'अन्तर्राष्ट्रीय' का सन्धि-विच्छेद है :
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'अन्तर्राष्ट्रीय' का सन्धि-विच्छेद इस प्रकार है: अन्तर + राष्ट्रीयः। 'अन्तर' का अर्थ होता है 'आंतरिक' या 'विभिन्न देशों के बीच' और 'राष्ट्रीय' का अर्थ होता है 'राष्ट्र से संबंधित'। इस प्रकार 'अन्तर्राष्ट्रीय' का अर्थ होता है 'विभिन्न देशों से संबंधित' या 'international'। Quick Tip: सन्धि-विच्छेद करते समय समझें कि शब्द के दोनों भाग एक दूसरे से किस प्रकार जुड़ते हैं।
12.(ख) (i) 'निर्विघ्नम्' में समास है :
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'निर्विघ्नम्' में समास 'कर्मधारय' है। 'निर्विघ्न' का अर्थ होता है 'विघ्न रहित' या 'जिसमें कोई विघ्न न हो' और 'म्' प्रत्यय जोड़ने से यह 'निर्विघ्नम्' हो जाता है। यहाँ 'निर्विघ्न' के साथ 'म्' प्रत्यय जोड़ने से यह कर्मधारय समास बनता है, जिसमें कोई कार्य या उद्देश्य का निरूपण किया जाता है। Quick Tip: कर्मधारय समास में एक शब्द के साथ दूसरा शब्द जुड़कर एक कार्य या अवस्था को दर्शाता है।
12.(ख) (ii) 'दशानन' में समास है :
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'दशानन' में समास 'तत्पुरुष' है। 'दशानन' का अर्थ है 'जिसके दस मुख हों' (दश + आनन), यह एक तत्पुरुष समास है, जिसमें प्रथम शब्द किसी विशेषता को व्यक्त करता है और दूसरा शब्द किसी व्यक्ति या वस्तु का विवरण करता है। इस समास में 'दश' और 'आनन' के संयोजन से 'दशानन' शब्द बना है, जो भगवान रावण का एक नाम है। Quick Tip: तत्पुरुष समास में मुख्य शब्द किसी विशेषता या गुण का बयान करता है, जैसे 'दशानन' में 'दश' (दस) से रावण के दस सिरों का उल्लेख किया गया है।
13. (क) (i) 'पूजित:' शब्द में प्रत्यय है :
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'पूजित:' शब्द में प्रत्यय 'क्त' है। 'पूज' धातु से 'क्त' प्रत्यय जोड़ने से यह 'पूजित' शब्द बनता है, जिसका अर्थ होता है 'पूजित किया हुआ' या 'जिसे पूजा गया हो'। यहाँ 'क्त' प्रत्यय क्रिया के पूर्ण होने या उसकी स्थिति का संकेत करता है।
Quick Tip: 'क्त' प्रत्यय कार्य की पूर्णता को दर्शाता है।
13. (क) (ii) 'बुद्धिमान्' में प्रत्यय है :
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'बुद्धिमान्' शब्द में प्रत्यय 'त्व' है। 'बुद्धि' शब्द से 'त्व' प्रत्यय जोड़ने से यह 'बुद्धिमान्' शब्द बनता है, जिसका अर्थ होता है 'जो बुद्धिमान हो' या 'जिसके पास बुद्धि हो'। 'त्व' प्रत्यय किसी गुण या विशेषता को व्यक्त करने के लिए प्रयोग किया जाता है।
Quick Tip: 'त्व' प्रत्यय गुण या विशेषता को दर्शाता है।
13. (ख) रेखांकित पदों में से किसी एक पद में विभक्ति तथा संबंधित नियम लिखिए :
(i) 'गृहं प्रति गच्छ ।'
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'गृहं प्रति गच्छ' वाक्य में 'गृहं' शब्द में कर्मविभक्ति है। 'गृहं' शब्द 'गृह' धातु से बनता है, और यहाँ 'ं' प्रत्यय कर्मविभक्ति को दर्शाता है। 'प्रति' के साथ 'गृहं' का प्रयोग दिशा या स्थान का सूचक होता है, जिसका अर्थ है 'घर की ओर जाना'।
Quick Tip: कर्मविभक्ति क्रिया के उद्देश्य या कार्य के स्थान को दर्शाती है।
13. (ख) (ii) 'उपाध्याय: छात्रैः समं स्नाति ।'
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'उपाध्याय: छात्रैः समं स्नाति' वाक्य में 'छात्रैः' शब्द में सम्प्रदानविभक्ति है। 'छात्रैः' शब्द में 'ै' प्रत्यय सम्प्रदानविभक्ति को दर्शाता है, जो 'किससे' या 'किसको' को बताता है। यहाँ 'छात्रैः' का अर्थ है 'छात्रों द्वारा'। यह विभक्ति उपभोक्ता या प्राप्तकर्ता को सूचित करती है।
Quick Tip: सम्प्रदानविभक्ति से प्राप्तकर्ता या दिशा को सूचित किया जाता है।
(ख) (iii) 'सः राज्ञः पुरुषः अस्ति ।'
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'सः राज्ञः पुरुषः अस्ति' वाक्य में 'राज्ञः' शब्द में अपादानविभक्ति है। 'राज्ञः' शब्द में 'ः' प्रत्यय अपादानविभक्ति को दर्शाता है, जो स्रोत या स्थिति को बताता है। यहाँ 'राज्ञः' का अर्थ है 'राजा का'। यह विभक्ति संबंध या स्थान के बारे में जानकारी प्रदान करती है।
Quick Tip: अपादानविभक्ति से स्रोत या स्थिति का बोध होता है।
अपने पिताजी को एक पत्र लिखिए, जिसमें आपके विद्यालय के 'वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह' का वर्णन किया गया हो ।
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प्रिय पिताजी,
सप्रेम नमस्कार।
मैं आशा करता हूँ कि आप स्वस्थ और प्रसन्न होंगे। मैं आपको यह पत्र अपने विद्यालय के वार्षिक पुरस्कार वितरण समारोह के बारे में बताने के लिए लिख रहा हूँ, जो पिछले सप्ताह हुआ था। यह समारोह हमारे विद्यालय में हर साल आयोजित किया जाता है, और इस बार यह कार्यक्रम विशेष रूप से शानदार था।
समारोह का उद्घाटन विद्यालय के प्रधानाचार्य ने किया, और इसके बाद विभिन्न कक्षाओं के छात्रों को उनके शैक्षिक और सह-शैक्षिक क्षेत्रों में उत्कृष्टता के लिए पुरस्कार दिए गए। मुझे भी 'श्रेष्ठ छात्र' के पुरस्कार से सम्मानित किया गया, जो मुझे बहुत गर्व का अनुभव हुआ। इसके अलावा, संगीत, कला, और खेलों में भी पुरस्कार वितरण हुए।
समारोह के अंत में प्रधानाचार्य ने हम सभी को कड़ी मेहनत और ईमानदारी से काम करने की प्रेरणा दी। पूरा कार्यक्रम बहुत ही शानदार और प्रेरणादायक था।
आपका बेटा,
[आपका नाम]
Quick Tip: पत्र लिखने में सरल और स्पष्ट भाषा का प्रयोग करें, ताकि भावनाएँ सही तरीके से व्यक्त हो सकें।





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