UP Board Class 12 Hindi Question Paper 2024 (Code 301 DA) with Solutions

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Shivam Yadav

Updated on - Oct 31, 2025

UP Board Class 12 Hindi Question Paper 2024 PDF (Code 301 DA) is available for download here. The Hindi exam was conducted on February 22, 2024 in the Evening Shift from 2 PM to 5:15 PM. The total marks for the theory paper are 100. Students reported the paper to be easy to moderate.

UP Board Class 12 Hindi Question Paper 2024 (Code 301 DA) with Solutions

UP Board Class 12 Hindi Question Paper 2024 PDF UP Board Class 12 Hindi Solutions 2024 PDF
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Question 1:

राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिंद' की रचना है:

  • (a) 'राजा-भोज का सपना'
  • (b) 'रानी केतकी की कहानी'
  • (c) 'प्रेमसागर'
  • (d) 'प्रेमवती'
Correct Answer: (a) 'राजा-भोज का सपना'
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राजा शिवप्रसाद 'सितारे हिंद' ने 'राजा-भोज का सपना' नामक रचना की थी। यह हिंदी साहित्य में गद्य लेखन की शुरुआत मानी जाती है।


Question 2:

भारतेन्दु युग के लेखक हैं:

  • (a) भगवत शरण उपाध्याय
  • (b) प्रताप नारायण मिश्र
  • (c) खुशीराम सहाय
  • (d) बैजनाथ सरन गुप्त
Correct Answer: (b) प्रताप नारायण मिश्र
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भारतेन्दु युग के प्रमुख साहित्यकार प्रताप नारायण मिश्र थे। वे भारतेन्दु हरिश्चंद्र के समकालीन और हिंदी गद्य साहित्य के प्रमुख योगदानकर्ताओं में से एक थे।


Question 3:

'भरी असफलताएं' किस विधा की रचना है?

  • (a) कहानी
  • (b) आत्मकथा
  • (c) डायरी
  • (d) जीवनी-साहित्य
Correct Answer: (b) आत्मकथा
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'भरी असफलताएं' एक आत्मकथा है, जिसमें लेखक ने अपने व्यक्तिगत जीवन के अनुभवों और असफलताओं का वर्णन किया है।


Question 4:

'आवारा मसीहा' के लेखक हैं:

  • (a) विष्णु प्रभाकर
  • (b) शिवदान सिंह चौहान
  • (c) राहुल सांकृत्यायन
  • (d) जैनेन्द्र
Correct Answer: (a) विष्णु प्रभाकर
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'आवारा मसीहा' हिंदी साहित्य के लेखक विष्णु प्रभाकर द्वारा लिखी गई प्रसिद्ध जीवनी है। यह शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के जीवन पर आधारित है।


Question 5:

हिंदी का प्रथम मौलिक उपन्यास है:

  • (A) 'तितली'
  • (B) 'कंकाल'
  • (C) 'परीक्षा गुरु'
  • (D) 'गबन'
Correct Answer: (C) 'परीक्षा गुरु'
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'परीक्षा गुरु' हिंदी का प्रथम मौलिक उपन्यास है। यह लाला श्रीनिवास दास द्वारा लिखा गया था और इसमें भारतीय समाज की तत्कालीन समस्याओं का वर्णन किया गया है।


Question 6:

'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल' यह काव्य पंक्ति है:

  • (A) अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की
  • (B) मैथिलीशरण गुप्त की
  • (C) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की
  • (D) नरेश मेहता की
Correct Answer: (C) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की
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'निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल' भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की प्रसिद्ध काव्य पंक्ति है। इसमें उन्होंने मातृभाषा के महत्व पर जोर दिया है।


Question 7:

'स्कूल के प्रति सूझ का विरोध है':

  • (A) भारतेन्दु-युग
  • (B) द्विवेदी-युग
  • (C) छायावाद
  • (D) प्रगतिवाद
Correct Answer: (C) छायावाद
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छायावाद के साहित्य में व्यक्तिगत भावनाओं और स्वतंत्रता की अभिव्यक्ति को प्राथमिकता दी गई है। स्कूल के प्रति सूझ का विरोध इसी भावनात्मक स्वतंत्रता का प्रतीक है।


Question 8:

'वैदेही वनवास' रचना है:

  • (A) रामनरेश त्रिपाठी की
  • (B) श्रीधर पाठक की
  • (C) अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की
  • (D) महादेवी वर्मा की
Correct Answer: (C) अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की
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'वैदेही वनवास' अयोध्यासिंह उपाध्याय 'हरिऔध' की रचना है। यह हिंदी काव्य में उनकी महत्वपूर्ण कृति है, जिसमें रामायण की कथा का वर्णन किया गया है।


Question 9:

भारतेन्दु ने स्त्री शिक्षा से संबंधित किस पत्रिका का प्रकाशन किया था?

  • (A) हरिश्चन्द्र-चंद्रिका
  • (B) 'हंस'
  • (C) 'कविवचन सुधा'
  • (D) 'बाला बोधिनी'
Correct Answer: (D) 'बाला बोधिनी'
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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने 'बाला बोधिनी' नामक पत्रिका का प्रकाशन किया, जो स्त्री शिक्षा और उनके अधिकारों पर केंद्रित थी। यह हिंदी साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान का प्रतीक है।


Question 10:

'गंगालहरी' के रचयिता हैं:

  • (A) जननाथ दास 'रत्नाकर'
  • (B) सूरदास
  • (C) तुलसीदास
  • (D) भारतेन्दु हरिश्चन्द्र
Correct Answer: (A) जननाथ दास 'रत्नाकर'
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'गंगालहरी' के रचयिता जननाथ दास 'रत्नाकर' हैं। यह रचना गंगा नदी के महत्व और उनकी महिमा को वर्णित करती है।


Question 11:

प्रस्तुत गद्यांश के पाठ एवं लेखक का नाम लिखिए।

Correct Answer:
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प्रस्तुत गद्यांश 'पथ के साथी' नामक पाठ से लिया गया है, जिसके लेखक सुभाष चंद्र बोस हैं।


Question 12:

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Correct Answer:
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रेखांकित अंश का तात्पर्य यह है कि जो व्यक्ति ऊँचाई पर पहुँचता है, वह अधिक उत्कृष्ट और आदर्शवादी होता है।


Question 13:

कौन-सी जोत विश्व की सर्वोत्तम जोत है?

Correct Answer:
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विश्व की सर्वोत्तम जोत वह है, जो जागरूक, लक्ष्यसिद्ध और सेवा-निष्ठ जीवन का प्रतीक है।


Question 14:

लेखक के लिए कौन-सा अनुभव चमत्कारी है?

Correct Answer:
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लेखक के लिए चमत्कारी अनुभव यह है कि भाषा और भेदभाव के बावजूद विचार और आदर्श एक समान रहते हैं।


Question 15:

'जागरण' और 'लक्ष्यसिद्धि' शब्दों के अर्थ लिखिए।

Correct Answer:
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'जागरण' का अर्थ है जागरूकता, और 'लक्ष्यसिद्धि' का अर्थ है अपने उद्देश्य को प्राप्त करना।


Question 16:

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Correct Answer:
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रेखांकित अंश का तात्पर्य यह है कि पृथ्वी, राष्ट्र और जनता के समन्वय से ही राष्ट्र का स्वरूप सजीव होता है।


Question 17:

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Correct Answer:
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रेखांकित अंश का तात्पर्य यह है कि पृथ्वी, राष्ट्र और जनता के समन्वय से ही राष्ट्र का स्वरूप सजीव होता है।


Question 18:

राष्ट्र का दूसरा अंग क्या है?

Correct Answer:
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राष्ट्र का दूसरा अंग जनता है, जो मातृभूमि पर निवास करती है।


Question 19:

राष्ट्र की कल्पना का कुंज क्या है?

Correct Answer:
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राष्ट्र की कल्पना का कुंज मातृभूमि की भावना है।


Question 20:

राष्ट्रभावना की कुंजी क्या है?

Correct Answer:
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राष्ट्रभावना की कुंजी नागरिकों के हृदय में समर्पण और एकता की भावना है।


Question 21:

प्रस्तुत पद्यांश के पाठ एवं कवि का नाम लिखिए।

Correct Answer:
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यह पद्यांश 'बिहारी सतसई' से लिया गया है, जिसके रचयिता कवि बिहारी हैं।


Question 22:

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Correct Answer:
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"छू के प्यारे कमल-पग को" में नायिका अपने प्रिय के चरणों को छूकर प्रेम व्यक्त करना चाहती है।


Question 23:

'कमल-पग' में कौन-सा अलंकार है?

Correct Answer:
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'कमल-पग' में रूपक अलंकार है, जहाँ चरणों की तुलना कमल से की गई है।


Question 24:

नायिका किससे और क्या विनती कर रही है?

Correct Answer:
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नायिका अपने प्रिय से विनती कर रही है कि यदि वह अन्य बातें न मान सके तो कम से कम उसके चरणों को छूकर प्रेम से आ जाए।


Question 25:

नायिका पवन को किसके कमल-पग को छू कर आने के लिए कह रही है?

Correct Answer:
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नायिका पवन को अपने प्रियतम के कमल जैसे चरणों को छूकर आने के लिए कह रही है।


Question 26:

प्रस्तुत पद्यांश के पाठ एवं कवि का नाम लिखिए।

Correct Answer:
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यह पद्यांश 'वसंत गीत' से लिया गया है। इसके रचयिता जयशंकर प्रसाद हैं, जिन्होंने वसंत ऋतु की सुंदरता और गहराई को व्यक्त किया है।


Question 27:

रेखांकित अंश की व्याख्या कीजिए।

Correct Answer:
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रेखांकित अंश वसंत के प्रभाव को दर्शाता है, जिसमें सौंदर्य, सौम्यता और नई ऊर्जा का प्रतीकात्मक वर्णन किया गया है।


Question 28:

मनु किससे अपने जीवन के विषय में बता रहे हैं?

Correct Answer:
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मनु अपने जीवन के रहस्य और उसके कठिन अनुभवों को वसंत के दूत से व्यक्त कर रहे हैं, जो जीवन में नई ऊर्जा और सौंदर्य का प्रतीक है।


Question 29:

मनु अपने आपको क्यों असहाय महसूस करते हैं?

Correct Answer:
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मनु जीवन की जटिलताओं और असमंजस में हैं, जिसके कारण वे असहर्ष और चिंतित महसूस कर रहे हैं।


Question 30:

'तिमिर' और 'चपला' शब्दों के अर्थ लिखिए।

Correct Answer:
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'तिमिर' का अर्थ है अंधकार और अज्ञात स्थिति, जबकि 'चपला' का अर्थ है चंचलता और हड़बड़ी।


Question 31:

जैनेन्द्र कुमार

Correct Answer:
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जैनेन्द्र कुमार हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासकार और कथाकार थे। उनका लेखन मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण और मानवीय संवेदनाओं को उजागर करता है। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं: 'त्यागपत्र', 'सुखदा', और 'परख'। उनका साहित्य भारतीय समाज और स्वतंत्रता संग्राम की झलक प्रस्तुत करता है। जैनेन्द्र कुमार ने हिंदी साहित्य में उपन्यास और कहानी लेखन में विशेष योगदान दिया और भारतीय समाज की मानसिकता और बदलाव को अपनी कहानियों में चित्रित किया। उनकी रचनाएँ समाज के विभिन्न पहलुओं को प्रकट करती हैं, विशेष रूप से मनुष्य के आंतरिक संघर्षों को। उन्होंने भारतीय समाज में सृजनात्मकता की नई दिशा को प्रेरित किया। उनके साहित्य में नारी जीवन, मानसिक तनाव, और सामाजिक असमानताएँ प्रमुख रूप से दर्शाई गई हैं। जैनेन्द्र कुमार के लेखन में उन मुद्दों का विश्लेषण भी देखने को मिलता है, जो समाज की सच्चाइयों को उजागर करते हैं। उनका लेखन आज भी प्रासंगिक है क्योंकि वे समाज की गहरी परतों को उजागर करते हैं, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज किया जाता है।


Question 32:

कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर'

Correct Answer:
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कन्हैयालाल मिश्र 'प्रभाकर' हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध निबंधकार और विचारक थे। उनका लेखन समाज सुधार, नैतिकता, और राष्ट्रीय चेतना पर आधारित था। उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं: 'सामाजिक क्रांति', 'सुधा के छींटे', और 'साहित्य की साधना'। कन्हैयालाल मिश्र का लेखन समाज में व्याप्त आंतरिक बुराईयों, अत्याचारों और असमानताओं के खिलाफ था। वे मानते थे कि समाज की उन्नति के लिए व्यक्तित्व का निर्माण और नैतिकता का पालन अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने अपने निबंधों में जीवन के सत्य, समाज की जिम्मेदारियाँ, और नैतिक शिक्षा को प्रमुख रूप से प्रस्तुत किया। उनका उद्देश्य समाज में व्याप्त अंधविश्वास और भ्रष्टाचार को दूर करना था। उन्होंने भारतीय समाज को जागरूक करने के लिए साहित्य का उपयोग किया और उसे एक सशक्त विचारधारा में बदलने की कोशिश की। उनके निबंधों में हमें साहित्य के साथ-साथ समाज के उत्थान की दिशा भी मिलती है।


Question 33:

हरिशंकर परसाई

Correct Answer:
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हरिशंकर परसाई हिंदी व्यंग्य साहित्य के प्रमुख लेखक थे। उनकी रचनाएँ समाज की विसंगतियों पर तीखा कटाक्ष करती हैं। उनकी प्रसिद्ध कृतियाँ हैं: 'रानी नागफनी की कहानी', 'विकलांग श्रद्धा का दौर', और 'तट की खोज'। परसाई का लेखन पाठकों को गहराई से सोचने पर मजबूर करता है, और उन्होंने समाज के भ्रष्टाचार, धार्मिक अंधविश्वास, और राजनीतिक असमानताओं को उजागर किया। वे व्यंग्य के माध्यम से समाज के मुद्दों पर तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त करते थे, जो साहित्य में गहरी सोच और सामाजिक जागरूकता का प्रेरक था। उनकी लेखनी में हास्य और तीखे कटाक्षों का अद्वितीय मिश्रण था, जो समाज के अंधेरे पहलुओं को उजागर करता था। उन्होंने न केवल साहित्य के माध्यम से समाज के मुद्दों को उठाया, बल्कि उन मुद्दों पर विचार करने की दिशा भी दी। परसाई के व्यंग्य में गहरी सामाजिक चेतना और सुधार की भावना निहित थी। उनका साहित्य समाज के विकृतियों पर बिना किसी आडंबर के सीधा प्रहार करता था, जो पाठकों के दिलो-दिमाग पर स्थायी प्रभाव छोड़ता था। वे भारतीय समाज के उत्थान के लिए व्यंग्य को एक मजबूत हथियार मानते थे।


Question 34:

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र

Correct Answer:
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भारतेन्दु हरिश्चन्द्र हिंदी साहित्य के 'आधुनिक हिंदी के जनक' माने जाते हैं। उन्होंने नाटक, कविता, और गद्य साहित्य में योगदान दिया। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं: 'भारत दुर्दशा', 'सत्य हरिश्चन्द्र', और 'वैदिकी हिंसा हिंसा न भवति'। उनका लेखन सामाजिक सुधार और राष्ट्रीय चेतना पर केंद्रित था। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने हिंदी साहित्य में न केवल नए प्रयोग किए, बल्कि भारतीय समाज को जागरूक करने का कार्य भी किया। उनका साहित्य हिंदी के समृद्ध साहित्यिक परंपरा का आधार बना और वे आधुनिक हिंदी साहित्य के प्रारंभिक नायक बने। उन्होंने हिंदी में नाटक की शुरुआत की और अपने लेखन से भारतीय समाज में जागरूकता और सुधार की आवश्यकता को महसूस कराया। वे भारतीय समाज की पुरानी परंपराओं और रीति-रिवाजों की आलोचना करते हुए उसे सामाजिक सुधार की दिशा में ले जाने की कोशिश करते थे। उनके नाटक और कविताएँ आज भी भारतीय समाज के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं।

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र का साहित्य सामाजिक सुधार की ओर प्रेरित करता है। उन्होंने अंधविश्वास, जातिवाद और महिला उत्पीड़न जैसे मुद्दों को अपने लेखन का विषय बनाया। 'सत्य हरिश्चन्द्र' जैसे नाटक ने भारतीय समाज को सही और गलत के बीच अंतर समझाया और सच्चाई की अहमियत को दर्शाया। उनके लेखन में भारतीय समाज की कुरीतियों के खिलाफ एक प्रबल आक्रोश दिखाई देता है।

उनकी रचनाएँ केवल साहित्यिक दृष्टि से ही महत्वपूर्ण नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक परिवर्तन और जागरूकता का भी प्रतीक हैं। भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की रचनाओं में भारतीय समाज को एक नया दृष्टिकोण और दिशा मिली, जिससे उन्होंने समाज की गलत परंपराओं और आदतों को चुनौती दी।


Question 35:

जगन्नाथ दास 'रत्नाकर'

Correct Answer:
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जगन्नाथ दास 'रत्नाकर' हिंदी भक्ति साहित्य के प्रसिद्ध कवि थे। उनकी कृति 'गंगालहरी' गंगा नदी की महिमा और भक्ति का वर्णन करती है। उनका लेखन आध्यात्मिकता और धार्मिक भावना से परिपूर्ण है। वे अपने भक्ति गीतों और कविता के माध्यम से गंगा नदी की पवित्रता और उसके प्रति श्रद्धा को व्यक्त करते थे। 'गंगालहरी' में गंगा के दिव्य गुणों, उसके निरंतर प्रवाह और उसकी जीवनदायिनी शक्ति की चर्चा की गई है। रत्नाकर की कविताएँ भक्ति भावना और प्रभु के प्रति समर्पण का उदाहरण प्रस्तुत करती हैं। वे धार्मिक एवं आध्यात्मिक साधना के महत्व पर भी जोर देते थे और समाज को उच्च आदर्शों की ओर प्रेरित करते थे। उनकी रचनाओं में शांति और संतुलन का संदेश मिलता है, जो आज भी पाठकों को प्रभावित करता है।

'गंगालहरी' की रचनाएँ हिंदी साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान रखती हैं। रत्नाकर का भक्ति दृष्टिकोण बहुत ही सहज और सामान्य था, जिससे वह सामान्य जनता तक अपनी बात पहुँचाने में सफल हुए। उनके गीतों का शास्त्रीय रूप कम था, लेकिन उनकी सरलता और भावनात्मक गहराई ने उसे जनमानस में लोकप्रिय बना दिया। वे गंगा को मां के रूप में पूजा करते थे और उनका संदेश था कि गंगा में स्नान से न केवल शरीर की शुद्धि होती है, बल्कि आत्मा की भी शुद्धि होती है।

उनकी कविताओं में गंगा के जल, उसकी लहरों और उसके माध्यम से भगवान के साथ आत्मिक संबंध को बहुत खूबसूरती से प्रस्तुत किया गया है। रत्नाकर का भक्ति साहित्य, समाज में उच्च आदर्शों की स्थापना, और धर्म के प्रति आस्थावान दृष्टिकोण उनकी सृजनात्मकता और साहित्यिक योगदान का प्रमाण है।

वे न केवल एक धार्मिक कवि थे, बल्कि उनके काव्य में समर्पण, तात्त्विकता और जीवन के आदर्श मूल्यों की भी गहरी समझ थी।


Question 36:

मैथिलीशरण गुप्त

Correct Answer:
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मैथिलीशरण गुप्त हिंदी के राष्ट्रकवि माने जाते हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं: 'साकेत', 'भारत-भारती', और 'जयद्रथ वध'। उनका लेखन राष्ट्रीयता, धार्मिकता, और सांस्कृतिक उत्थान पर केंद्रित है। 'साकेत' में उन्होंने राम के जीवन और अयोध्या के सुखद भविष्य की परिकल्पना को रचनात्मक रूप में प्रस्तुत किया है। गुप्त जी के काव्य में भारतीय संस्कृति और इतिहास की महानता का निरंतर वर्णन मिलता है, जो समाज में एक नई जागरूकता और राष्ट्रप्रेम की भावना पैदा करता है।

मैथिलीशरण गुप्त ने अपने लेखन के माध्यम से स्वतंत्रता संग्राम के प्रति अपनी निष्ठा और देशभक्ति को व्यक्त किया। उनका साहित्य भारतीय समाज की सशक्त और जागरूक भावनाओं का प्रतीक बन गया। 'भारत-भारती' में उन्होंने भारत के गौरवपूर्ण इतिहास और संस्कृति की महानता को प्रदर्शित किया। उनका काव्य समाज के प्रत्येक वर्ग को जागरूक करने वाला था और उनके लेखन से भारतीय समाज में एक नई जागरूकता आई।

गुप्त जी के काव्य की विशेषता यह है कि उन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से भारतीय सभ्यता की महानता और देशभक्ति का प्रचार किया, जिससे उनका साहित्य हमेशा याद किया जाएगा।


Question 37:

कहानी-तत्वों के आधार पर 'लाटी' और 'धु्रव यात्रा' कहानी की समीक्षात्मक विश्लेषण कीजिए।

Correct Answer:
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कहानी-तत्वों के आधार पर 'लाटी' और 'ध्रुव यात्रा' की समीक्षा करते समय दोनों की संरचना, विषय, और पात्रों का विश्लेषण किया जाता है।

'लाटी' कहानी में मानवीय संबंधों और संघर्षों का चित्रण है, जो सामाजिक और मानसिक दबावों के कारण उत्पन्न होते हैं। इसके पात्र समाज में व्याप्त अन्याय, असमानता, और संघर्ष का सामना करते हैं, जो कहानी की केंद्रीय थीम बनते हैं।

वहीं, 'ध्रुव यात्रा' में विज्ञान और यांत्रिक ज्ञान का प्रभाव दिखाई देता है, जो समाज और जीवन के अन्य पहलुओं पर अपना असर डालता है। इसमें पात्रों की मनोवृत्तियाँ और उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण का आदान-प्रदान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

इन दोनों कहानियों में कहानी-तत्वों के माध्यम से जीवन के विविध पहलुओं का प्रतिनिधित्व किया गया है। इनमें से 'लाटी' कहानी में सामाजिक जागरूकता की आवश्यकता पर बल दिया गया है, जबकि 'ध्रुव यात्रा' में तंत्रज्ञान के समग्र विकास की महत्वपूर्ण भूमिका को प्रदर्शित किया गया है।


Question 38:

'खून का रिश्ता' कहानी के उद्देश्य पर प्रकाश डालिए:
(अधिकतम शब्द-सीमा 80 शब्द)

Correct Answer:
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'खून का रिश्ता' कहानी परिवार और संबंधों की गहराई को दर्शाती है। इसमें यह बताया गया है कि खून का रिश्ता केवल शारीरिक संबंध नहीं है, बल्कि इसमें भावनात्मक और नैतिक जुड़ाव का गहरा महत्व है। यह कहानी परिवार में त्याग, प्रेम, और समझ की भावना को बढ़ावा देती है। लेखक ने पारिवारिक मूल्यों और रिश्तों की सच्चाई को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। कहानी के माध्यम से यह संदेश दिया गया है कि रिश्ते भावनाओं और समझदारी पर आधारित होते हैं, और इन्हें सही तरीके से निभाना चाहिए। इसके अलावा, कहानी में यह भी दर्शाया गया है कि पारिवारिक संबंधों में स्वार्थ और मतभेदों से ऊपर उठकर एकता और सहयोग का महत्व है। यह रिश्तों को सिर्फ खून से जोड़ने के बजाय, इंसानियत और सद्भावना से जोड़ने की ओर प्रेरित करती है। इस प्रकार, लेखक ने परिवार और रिश्तों की वास्तविकता को उजागर किया है और यह दिखाया है कि हर रिश्ते में त्याग, समझ, और सहनशीलता की आवश्यकता होती है। कहानी का उद्देश्य पारिवारिक संबंधों की संवेदनशीलता और उनके प्रति जिम्मेदारी को समझाना है। लेखक ने यह भी बताया कि सही आचरण और सच्चाई के रास्ते पर चलकर हम परिवारों के बीच विश्वास और एकता को मजबूत कर सकते हैं।


Question 39:

'रश्मिरथी' खण्डकाव्य के आधार पर कर्ण की चारित्रिक विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

Correct Answer:
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'रश्मिरथी' खण्डकाव्य में कर्ण का चित्रण एक महान नायक के रूप में किया गया है, जिनकी चारित्रिक विशेषताएँ जीवन में साहस, त्याग, और नैतिकता को दर्शाती हैं। कर्ण के चरित्र में निम्नलिखित प्रमुख विशेषताएँ हैं:


निष्ठा और कर्तव्यपरायणता: कर्ण हमेशा अपने वचन और कर्तव्य के प्रति निष्ठावान रहता है। उसने हमेशा अपनी प्रतिज्ञाओं और वचन को निभाने के लिए अपने व्यक्तिगत दुखों और समस्याओं की उपेक्षा की। उसकी निष्ठा उसे एक आदर्श पात्र बनाती है।
दया और उदारता: कर्ण की सबसे प्रमुख विशेषता उसकी दया और उदारता है। वह हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहता है, और अपने शत्रु के साथ भी दयालुता से पेश आता है। यह उसकी महानता को और बढ़ाता है।
साहस और शौर्य: कर्ण ने हर युद्ध में अद्वितीय साहस और वीरता का परिचय दिया। उसका शौर्य केवल उसकी युद्धकला में नहीं, बल्कि अपने निःस्वार्थ संघर्षों में भी झलकता है।
त्याग और बलिदान: कर्ण का जीवन त्याग और बलिदान का प्रतीक है। उसने हमेशा दूसरों के हितों के लिए अपने व्यक्तिगत लाभ और सुख का बलिदान दिया। उसकी यह भावना उसे एक महान नायक के रूप में प्रस्तुत करती है।
सच्चाई और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता: कर्ण का जीवन सच्चाई और न्याय की सख्त रक्षा करने का उदाहरण है। उसने अपने जीवन में कभी भी झूठ का सहारा नहीं लिया और हमेशा अपनी सिद्धांतों पर अडिग रहा।
आत्मविश्वास और साहसिक निर्णय: कर्ण ने हर चुनौती का सामना किया और कभी भी हार मानने का नाम नहीं लिया। उसने अपने भाग्य से लड़ते हुए भी आत्मविश्वास और साहस से हर परिस्थिति का सामना किया।


कर्ण का जीवन यह सिद्ध करता है कि एक व्यक्ति अपने जन्म और परिस्थितियों से ऊपर उठकर अपनी क्षमता और आस्थाओं के बल पर महानता प्राप्त कर सकता है। उसकी दृढ़ इच्छाशक्ति और नैतिक बलिदान उसे भारतीय महाकाव्य के एक अद्वितीय नायक के रूप में प्रतिष्ठित करती है।


Question 40:

'रश्मिरथी' खण्डकाव्य की प्रमुख घटना का वर्णन कीजिए।

Correct Answer:
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'रश्मिरथी' खण्डकाव्य की प्रमुख घटना कर्ण और अर्जुन के बीच महाभारत के युद्ध के दौरान हुआ उनका प्रसिद्ध मुकाबला है। इस घटना में कर्ण ने अपनी पूरी शक्ति और कौशल का परिचय दिया, लेकिन अंततः वह अर्जुन से हार गया।

कर्ण की प्रमुख घटनाएँ निम्नलिखित हैं:


कर्ण का युद्ध में प्रवेश: कर्ण ने अपने जीवन के सबसे कठिन युद्ध का सामना किया। युद्धभूमि में उसे अपनी वीरता का प्रदर्शन करने का अवसर मिला, लेकिन यह उसकी नियति थी कि वह अर्जुन के हाथों पराजित होगा।
कर्ण का शाप: कर्ण के साथ एक और महत्वपूर्ण घटना जुड़ी हुई है, वह है उसका शाप। कर्ण को उसके गुरु परशुराम ने शाप दिया था कि वह युद्ध के दौरान अपनी शक्तियों का सही उपयोग नहीं कर पाएगा। यह शाप उसकी हार का कारण बना।
अर्जुन और कर्ण का अंतिम मुकाबला: कर्ण और अर्जुन के बीच युद्ध का यह क्षण महाभारत के सबसे महत्वपूर्ण मोड़ों में से एक था। दोनों ने अपनी पूरी शक्ति का उपयोग किया, लेकिन कर्ण का रथ सच्चे क्षण में टूट गया और वह अर्जुन से हार गया। यह घटना कर्ण की महानता और दुर्भाग्य दोनों को दर्शाती है।
कर्ण का उद्धारण: कर्ण के जीवन की इस प्रमुख घटना ने उसे एक नायक के रूप में प्रस्तुत किया, जिसने अपने जीवन में अनेक संघर्षों और बलिदानों का सामना किया।


यह घटना कर्ण के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ है, जहाँ उसकी वीरता, साहस, और भाग्य के बीच संघर्ष उजागर होता है। इस घटना ने कर्ण को एक आदर्श योद्धा और बलिदानी के रूप में प्रतिष्ठित किया।


Question 41:

'सत्य की जीत' खण्डकाव्य के आधार पर प्रमुख पात्र का चरित्र चित्रण कीजिए।

Correct Answer:
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'सत्य की जीत' खण्डकाव्य में प्रमुख पात्र सत्य और धर्म के प्रतीक होते हैं, जो अपने आदर्शों के प्रति पूरी तरह निष्ठावान रहते हैं। इस काव्य में सत्य के प्रतीक के रूप में भगवान श्रीराम का चरित्र चित्रित किया गया है। उनके जीवन और संघर्षों के माध्यम से सत्य की महत्ता और विजय का संदेश दिया गया है।

श्रीराम के प्रमुख चरित्र गुण निम्नलिखित हैं:


सच्चाई और नैतिकता: श्रीराम का जीवन सत्य और नैतिकता का आदर्श है। वह हमेशा सत्य के मार्ग पर चलते हैं, चाहे वे व्यक्तिगत संकटों का सामना कर रहे हों या समाज के लिए किसी निर्णय को लागू करना हो।
कर्तव्यनिष्ठा: श्रीराम का जीवन कर्तव्य के प्रति उनकी निष्ठा को दर्शाता है। वह अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को सर्वोपरि मानते हैं और उन्हें निभाने के लिए हर परिस्थिति में खुद को समर्पित कर देते हैं।
धैर्य और संयम: श्रीराम का जीवन धैर्य और संयम का प्रतीक है। उन्होंने रावण जैसे शक्तिशाली शत्रु से संघर्ष करते हुए भी कभी अपने संयम को खोया नहीं।
त्याग और बलिदान: श्रीराम ने अपने व्यक्तिगत सुख और इच्छाओं को त्याग कर हमेशा अपने आदर्शों और धर्म को सर्वोपरि रखा। उनका जीवन हमेशा दूसरों के भले के लिए बलिदान देने का उदाहरण प्रस्तुत करता है।
वीरता और साहस: श्रीराम ने राक्षसों से युद्ध किया और रावण जैसे शक्तिशाली शत्रु का वध किया, जो उनके अद्वितीय साहस और वीरता को दर्शाता है।


श्रीराम का जीवन एक आदर्श है, जो हमें सत्य के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। उनका चरित्र हमें यह सिखाता है कि सत्य, धर्म, और कर्तव्य के मार्ग पर चलकर किसी भी संकट को पार किया जा सकता है।


Question 42:

'सत्य की जीत' खण्डकाव्य की प्रमुख घटना का उल्लेख कीजिए।

Correct Answer:
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'सत्य की जीत' खण्डकाव्य की प्रमुख घटना भगवान श्रीराम द्वारा रावण पर विजय प्राप्त करना है। इस काव्य में यह दर्शाया गया है कि सत्य, धर्म और कर्तव्य के मार्ग पर चलने से जीवन की सभी कठिनाइयाँ पार की जा सकती हैं। रावण के अत्याचारों से पीड़ित पृथ्वी ने भगवान श्रीराम को राक्षसों से युद्ध करने के लिए प्रेरित किया। श्रीराम ने अपने अनुज लक्ष्मण, अपनी सेना, और मित्रों की सहायता से रावण का वध किया।

इस घटना से सत्य की विजय का संदेश मिलता है, जो यह सिद्ध करता है कि बुराई और अत्याचार का अंत सत्य और धर्म की शक्ति से होता है। श्रीराम का जीवन सत्य के मार्ग पर चलने का आदर्श प्रस्तुत करता है।


श्रीराम का रावण से युद्ध: श्रीराम ने रावण से युद्ध किया, जो कि सत्य और धर्म के मार्ग की विजय का प्रतीक था। इस युद्ध में श्रीराम ने अपने सभी शत्रुओं को पराजित किया और रावण को भी हराया।
सत्य की विजय: इस युद्ध में सत्य और धर्म की जीत हुई। रावण जैसे महान और शक्तिशाली शत्रु को हराकर श्रीराम ने यह साबित किया कि सत्य का मार्ग हमेशा विजयी होता है।


इस प्रकार, 'सत्य की जीत' खण्डकाव्य की प्रमुख घटना श्रीराम की रावण पर विजय और सत्य की सर्वोत्तम शक्ति को दर्शाती है।


Question 43:

'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य की प्रमुख विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

Correct Answer:
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'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य एक धार्मिक और दार्शनिक काव्य है, जिसमें जीवन, मोक्ष और आत्मसाक्षात्कार की महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा की गई है। यह काव्य विशेष रूप से आध्यात्मिक मुक्ति (मोक्ष) के मार्ग पर आधारित है और आत्मा की शुद्धता और भगवान के प्रति समर्पण का संदेश देता है।

'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:


आध्यात्मिक मुक्ति का विचार: इस खण्डकाव्य में जीवन के उद्देश्यों पर ध्यान केंद्रित किया गया है, जिसमें मुक्ति (मोक्ष) प्राप्ति के लिए उपासना, साधना और भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण की आवश्यकता पर जोर दिया गया है।
धर्म और कर्म का महत्व: 'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य में यह बताया गया है कि सत्य और धर्म के मार्ग पर चलकर ही व्यक्ति मोक्ष को प्राप्त कर सकता है। इसे जीवन के सर्वोत्तम उद्देश्य के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
समाज सुधार और आत्मशुद्धि: इस काव्य में व्यक्ति को अपनी आत्मा की शुद्धि और समाज में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया गया है। यह काव्य समाज के लिए एक आदर्श प्रस्तुत करता है, जहाँ व्यक्ति अपनी आत्मा की मुक्ति के लिए कर्म करता है।
सत्कर्म और भक्ति: 'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य में भक्ति और सत्कर्म की महत्ता को उजागर किया गया है। भगवान के प्रति निष्ठा, सेवा और भक्ति को मुक्ति प्राप्ति के मार्ग के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
साधना और ध्यान: खण्डकाव्य में साधना और ध्यान की विधियों का उल्लेख है, जो आत्मा के शुद्धिकरण और मोक्ष के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इन विधियों से मनुष्य अपने भीतर के अज्ञान और मोह को समाप्त कर सकता है।


इस प्रकार, 'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य की विशेषताएँ उसे धार्मिक, दार्शनिक और आध्यात्मिक दृष्टि से एक महत्वपूर्ण काव्य बनाती हैं।


Question 44:

'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य के नायक का चरित्र-चित्रण कीजिए।

Correct Answer:
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'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य का नायक एक धार्मिक, आध्यात्मिक और समर्पित व्यक्ति है, जो जीवन में मुक्ति की प्राप्ति के लिए सच्चे मार्ग पर चलता है। नायक का चरित्र पूरी तरह से भगवान के प्रति भक्ति, आत्मशुद्धि, और समाज के प्रति अपने कर्तव्यों के निर्वहन में आधारित है।

नायक की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:


आध्यात्मिक समर्पण: नायक का जीवन भगवान के प्रति पूर्ण समर्पण और भक्ति से भरा हुआ है। वह भगवान के आदेशों का पालन करता है और उन्हें अपनी जीवनधारा मानता है। उसकी भक्ति और साधना से ही उसकी आत्मा शुद्ध होती है।
धर्म और कर्तव्य का पालन: नायक ने जीवन में धर्म और कर्तव्य को सर्वोपरि रखा है। वह समाज और अपने परिवार के लिए अपने कर्तव्यों को निभाता है, और यही कारण है कि उसे भगवान की विशेष कृपा प्राप्त होती है।
साधना और तपस्या: नायक ने आत्मा की शुद्धि और मुक्ति प्राप्ति के लिए कठिन साधना और तपस्या की है। उसकी जीवनशैली में योग, ध्यान और तपस्या की महत्वपूर्ण भूमिका है।
समाज के प्रति जिम्मेदारी: नायक ने समाज को सुधारने और उसे सही मार्ग पर चलाने के लिए भी अपने जीवन का उद्देश्य निर्धारित किया है। वह न केवल व्यक्तिगत मोक्ष की ओर बढ़ता है, बल्कि समाज के भले के लिए भी कार्य करता है।
सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलना: नायक सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलता है, और उसका जीवन इसी आदर्श के अनुसार आकार लेता है। वह अपने कर्मों से यह साबित करता है कि सत्य ही मुक्ति का मार्ग है।


नायक का चरित्र 'मुक्तियज्ञ' खण्डकाव्य में एक आदर्श रूप प्रस्तुत करता है, जो हमें बताता है कि आत्मा की शुद्धि और मुक्ति के लिए भक्ति, साधना, और समाज के प्रति जिम्मेदारी का निर्वहन कितना महत्वपूर्ण है।


Question 45:

'त्यागपथी' खण्डकाव्य के प्रमुख नारी पात्र की चारित्रिक विशेषताओं पर प्रकाश डालिए।

Correct Answer:
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'त्यागपथी' खण्डकाव्य में प्रमुख नारी पात्र का चित्रण त्याग, बलिदान और महान नैतिकता की मिसाल के रूप में किया गया है। यह पात्र सामाजिक और पारिवारिक कर्तव्यों के प्रति अपनी निष्ठा और समर्पण के लिए प्रसिद्ध है। उसकी विशेषताएँ उसकी अद्वितीय मानसिकता और संघर्षों को दर्शाती हैं, जो उसे एक आदर्श नारी बनाती हैं।

प्रमुख नारी पात्र की विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:


त्याग और बलिदान: इस पात्र ने अपने व्यक्तिगत सुखों और इच्छाओं को त्याग कर परिवार और समाज के भले के लिए अपना जीवन समर्पित किया है। वह हमेशा दूसरों के लिए अपने व्यक्तिगत लाभों का बलिदान करने के लिए तैयार रहती है।
कर्तव्यनिष्ठा: नारी पात्र हमेशा अपने कर्तव्यों के प्रति निष्ठावान रहती है। चाहे वह पति, परिवार या समाज के लिए हो, वह अपने कर्तव्यों का पालन सच्चे दिल से करती है।
समाज सुधारक: यह पात्र समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ खड़ी होती है और उसे सुधारने के लिए हर संभव प्रयास करती है। वह समाज में नैतिकता और शुद्धता का प्रसार करने का कार्य करती है।
धैर्य और संयम: नारी पात्र के पास असाधारण धैर्य और संयम है, जो उसे कठिन परिस्थितियों में भी संतुलित और दृढ़ रहने की क्षमता प्रदान करता है। वह किसी भी संकट का सामना शांति और साहस के साथ करती है।
आध्यात्मिक शक्ति: इस पात्र में एक गहरी आध्यात्मिक शक्ति है, जो उसे आंतरिक शांति और संतुलन प्रदान करती है। उसकी भक्ति और विश्वास उसे कठिनतम परिस्थितियों में भी उबारने की शक्ति देते हैं।


इस प्रकार, 'त्यागपथी' खण्डकाव्य की प्रमुख नारी पात्र का चरित्र त्याग, कर्तव्य, और समाज के प्रति समर्पण का आदर्श प्रस्तुत करता है। उसकी चारित्रिक विशेषताएँ उसे एक आदर्श नारी बनाती हैं, जो हर महिला के लिए प्रेरणा का स्रोत बन सकती है।


Question 46:

'त्यागपथी' खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए।

Correct Answer:
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'त्यागपथी' खण्डकाव्य एक प्रेरणादायक धार्मिक और दार्शनिक काव्य है, जो त्याग, बलिदान और समाज के प्रति निष्ठा के आदर्शों पर आधारित है। यह खण्डकाव्य जीवन के सच्चे उद्देश्य और नैतिकता के महत्व को उजागर करता है। इसमें नायक और नारी पात्रों के माध्यम से त्याग और समर्पण के मार्ग पर चलने का संदेश दिया गया है।

'त्यागपथी' खण्डकाव्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:


त्याग और बलिदान: इस काव्य में प्रमुख पात्रों के माध्यम से त्याग और बलिदान की महत्वपूर्ण बातें व्यक्त की गई हैं। पात्रों ने अपने व्यक्तिगत सुखों को त्यागकर समाज और परिवार के भले के लिए अपने कर्तव्यों को निभाया।
धर्म और नैतिकता: काव्य में धर्म और नैतिकता का सर्वोच्च महत्व है। यह खण्डकाव्य यह संदेश देता है कि जीवन में सच्चाई, धर्म और नैतिकता के मार्ग पर चलकर ही व्यक्ति समाज में आदर्श स्थापित कर सकता है।
सामाजिक सुधार: 'त्यागपथी' में सामाजिक सुधार की दिशा में कदम उठाने और बुराईयों के खिलाफ खड़ा होने का संदेश दिया गया है। काव्य में समाज की अच्छाई और शुद्धता के लिए संघर्ष और बलिदान की प्रेरणा दी जाती है।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण: यह खण्डकाव्य आध्यात्मिक दृष्टिकोण को प्रमुख रूप से प्रस्तुत करता है, जिसमें आत्मा की शुद्धि और जीवन के उच्चतम उद्देश्य (मोक्ष) की प्राप्ति के लिए कर्तव्यों को निभाने पर बल दिया गया है।
नारी पात्रों की महिमा: खण्डकाव्य में नारी पात्रों का महत्वपूर्ण स्थान है। नारी पात्रों का चित्रण त्याग, समर्पण, और समाज के प्रति जिम्मेदारी के प्रतीक के रूप में किया गया है।
आत्मविश्वास और साहस: काव्य में नायक और नायिकाओं के पात्र आत्मविश्वास और साहस के प्रतीक हैं, जो जीवन के कठिन संघर्षों का सामना करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ते हैं।


इस प्रकार, 'त्यागपथी' खण्डकाव्य एक आदर्श और प्रेरणादायक काव्य है, जो त्याग, बलिदान, और समाज के प्रति जिम्मेदारी के महत्व को उजागर करता है।


Question 47:

'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाओं का वर्णन कीजिए।

Correct Answer:
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'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य में प्रमुख घटनाएँ उस समय की सामाजिक और धार्मिक स्थितियों की गहरी तस्वीर प्रस्तुत करती हैं। यह खण्डकाव्य जीवन के महत्व, धार्मिक जागृति, और समाज में सुधार की आवश्यकता को उजागर करता है। इसमें नायक के संघर्षों, सिद्धांतों और आदर्शों का चित्रण किया गया है, जो उसे आत्मज्ञान और समाज के भले के लिए प्रेरित करते हैं।

'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य की प्रमुख घटनाएँ निम्नलिखित हैं:


नायक का आत्मज्ञान: खण्डकाव्य की शुरुआत नायक के आत्मज्ञान की घटना से होती है, जिसमें वह अपने जीवन के उद्देश्य और सत्य को समझता है। नायक ने जीवन के उद्देश्य को पहचानते हुए सत्य की खोज में एक नया रास्ता चुना।
धर्म और समाज के बीच संघर्ष: एक महत्वपूर्ण घटना में नायक समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार और अंधविश्वास के खिलाफ खड़ा होता है। वह समाज में सुधार लाने के लिए हर संभव प्रयास करता है, चाहे वह व्यक्तिगत कष्टों को सहन करना पड़े।
आध्यात्मिक संघर्ष: नायक अपने जीवन में कई आध्यात्मिक संघर्षों से गुजरता है, जिसमें उसे अपनी इच्छाओं और कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाए रखना पड़ता है। यह संघर्ष उसे एक गहरी आंतरिक शांति और जागृति की ओर ले जाता है।
सामाजिक सुधार की पहल: नायक ने समाज में सुधार की दिशा में कदम उठाए। उसने धार्मिक आडंबरों और अंधविश्वासों के खिलाफ आवाज उठाई और समाज में शिक्षा और जागृति की आवश्यकता पर बल दिया।
सिद्धांतों की रक्षा: नायक ने अपने सिद्धांतों और आदर्शों की रक्षा करते हुए समाज में व्याप्त बुराइयों के खिलाफ संघर्ष किया। यह घटना उसकी निष्ठा, साहस और सत्य के प्रति उसकी अडिग श्रद्धा को दर्शाती है।


इन घटनाओं के माध्यम से 'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य जीवन के उद्देश्य, धर्म, और समाज सुधार के महत्व को स्पष्ट करता है। यह खण्डकाव्य व्यक्ति को अपने कर्तव्यों और सिद्धांतों के प्रति निष्ठावान रहने का संदेश देता है।


Question 48:

'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य की सामान्य विशेषताओं का उल्लेख कीजिए।

Correct Answer:
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'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य एक धार्मिक और सामाजिक दृष्टिकोण से प्रबुद्ध काव्य है, जो जीवन, समाज, और आत्मज्ञान के गहरे मुद्दों को उजागर करता है। यह खण्डकाव्य आध्यात्मिक जागृति, धार्मिक सिद्धांतों और सामाजिक सुधार के महत्वपूर्ण संदेशों को प्रस्तुत करता है।

'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य की सामान्य विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:


आध्यात्मिक और सामाजिक संदेश: खण्डकाव्य में आध्यात्मिक और सामाजिक जागरूकता का विशेष महत्व है। यह खण्डकाव्य व्यक्ति को धर्म, सत्य और समाज सुधार के लिए प्रेरित करता है।
सिद्धांतों पर दृढ़ विश्वास: काव्य में नायक के माध्यम से सिद्धांतों, नैतिकता और कर्तव्य का पालन करने की आवश्यकता को प्रस्तुत किया गया है। नायक अपने जीवन में सत्य के प्रति अपनी निष्ठा बनाए रखता है।
समाज में सुधार की आवश्यकता: 'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य में यह संदेश दिया गया है कि समाज में सुधार की आवश्यकता है, और यह सुधार केवल धार्मिक जागरूकता और शिक्षा के माध्यम से ही संभव है।
धर्म और सत्य के प्रति श्रद्धा: खण्डकाव्य में धर्म, सत्य और ईश्वर के प्रति श्रद्धा का अत्यधिक महत्व है। यह काव्य व्यक्ति को सत्य के मार्ग पर चलने और अपने धर्म को निभाने के लिए प्रेरित करता है।
काव्य में सरलता और प्रवाह: काव्य का रूप सरल और प्रवाहपूर्ण है, जिससे इसे पढ़ने में आसानी होती है और इसके संदेश को आसानी से समझा जा सकता है। काव्य का भाषा प्रयोग भी सहज और प्रभावी है।
आध्यात्मिक विकास की प्रेरणा: खण्डकाव्य में आत्मा के शुद्धिकरण और आत्मज्ञान की प्रक्रिया का वर्णन किया गया है, जिससे पाठकों को आध्यात्मिक उन्नति और शांति प्राप्त करने की प्रेरणा मिलती है।


इस प्रकार, 'आलोकवृत्त' खण्डकाव्य जीवन, धर्म, और समाज के बीच संतुलन बनाए रखने का संदेश देता है और व्यक्ति को आध्यात्मिक और सामाजिक जागरूकता की ओर प्रेरित करता है।


Question 49:

'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य की विशेषताएँ लिखिए।

Correct Answer:
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'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं का प्रतिनिधित्व करता है। इसमें श्रवणकुमार के चरित्र और उनके द्वारा किए गए कर्तव्यों की महिमा का उल्लेख किया गया है। यह खण्डकाव्य न केवल एक पुत्र के कर्तव्यों को दर्शाता है, बल्कि इसमे त्याग, भक्ति और माता-पिता के प्रति श्रद्धा का संदेश भी मिलता है।

'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं:


पिता के प्रति निष्ठा: श्रवणकुमार का जीवन अपने माता-पिता के प्रति पूर्ण निष्ठा और समर्पण का प्रतीक है। उन्होंने अपने अंधे माता-पिता की सेवा के लिए कठिन यात्रा की, जिससे यह संदेश मिलता है कि सच्ची भक्ति और निष्ठा किसी भी बलिदान से ऊपर होती है।
त्याग और बलिदान: श्रवणकुमार ने अपने व्यक्तिगत सुखों और आरामों को त्यागकर अपने माता-पिता की सेवा को सर्वोपरि रखा। उनका जीवन त्याग और बलिदान का आदर्श प्रस्तुत करता है।
धर्म और कर्तव्य का पालन: श्रवणकुमार ने धर्म और कर्तव्य को सर्वोपरि माना। उनकी यात्रा और कार्यों में धर्म का पालन प्रमुख था, और उन्होंने अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए हर कठिनाई को स्वीकार किया।
माता-पिता के प्रति श्रद्धा: काव्य में माता-पिता के प्रति श्रद्धा का अत्यधिक महत्व है। श्रवणकुमार ने यह सिद्ध कर दिया कि माता-पिता की सेवा से बढ़कर कोई पुण्य कार्य नहीं है।
समानांतर संघर्ष और प्रेरणा: श्रवणकुमार का संघर्ष न केवल शारीरिक था, बल्कि मानसिक और आध्यात्मिक भी था। उनका जीवन यह सिखाता है कि किसी भी महान कार्य को करने के लिए भीतर से प्रेरणा और दृढ़ संकल्प की आवश्यकता होती है।


इस प्रकार, 'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य के माध्यम से हमें त्याग, श्रद्धा, और कर्तव्य की सच्ची परिभाषा मिलती है। यह खण्डकाव्य हमें यह सिखाता है कि जीवन में हमें अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा से करना चाहिए।


Question 50:

'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य की प्रमुख घटना को अपने शब्दों में लिखिए।

Correct Answer:
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'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य की प्रमुख घटना वह समय है जब श्रवणकुमार अपने अंधे माता-पिता को तीर्थयात्रा पर ले जाने के लिए जंगल की कठिन यात्रा पर जाता है। उसका मुख्य उद्देश्य अपने माता-पिता की सेवा करना था, क्योंकि वे अंधे थे और स्वयं यात्रा करने में असमर्थ थे। श्रवणकुमार ने अपने माता-पिता को कंधे पर रखकर लंबी यात्रा की। इस दौरान, राजा दशरथ ने श्रवणकुमार को गलती से शिकार समझकर तीर चला दिया, जिससे श्रवणकुमार की मृत्यु हो गई।

इस घटना के बाद, श्रवणकुमार के माता-पिता ने इस दुखद घटना को जानने के बाद कड़ी सजा की मांग की। उनकी निष्ठा, त्याग, और कर्तव्य के प्रति श्रद्धा ने उन्हें महान बना दिया, और यह घटना भारतीय समाज में माता-पिता के प्रति आदर और कर्तव्य के महत्व को दर्शाती है।


माता-पिता की सेवा का कर्तव्य: यह घटना हमें यह सिखाती है कि माता-पिता की सेवा और उनका आदर करना सर्वोत्तम कर्तव्य है।
त्याग और बलिदान: श्रवणकुमार का अपने माता-पिता के प्रति समर्पण और बलिदान का उदाहरण आज भी प्रेरणास्त्रोत है।
दुखद परिणाम: यह घटना एक दुखद परिणाम के रूप में सामने आती है, जब एक गलतफहमी के कारण श्रवणकुमार की मृत्यु हो जाती है।


इस प्रकार, 'श्रवणकुमार' खण्डकाव्य की प्रमुख घटना न केवल त्याग और कर्तव्य का प्रतीक है, बल्कि यह हमें यह भी सिखाती है कि किसी व्यक्ति का जीवन उसके कर्तव्यों के प्रति निष्ठा से महान बनता है।


Question 51:

निम्नलिखित संस्कृत गद्यांश का सन्दर्भ - सहित हिन्दी में अनुवाद कीजिए:
जन्मतः दशमे दिने 'शिवं भजेदयम्' इति बुद्धया पिता स्वसुतस्य मूलशङ्कर इति नाम अकरोत्, अष्टमे वर्षे चास्योपनयनमकरोत्। त्रयोदशवर्षं प्राप्तवतेऽस्मै मूलशङ्कराय पिता शिवरात्रिव्रतमाचरितुम् अकथयत्। पितुराज्ञानुसारं मूलशङ्करः सर्वमपि व्रतविधानमकरोत्।

Correct Answer:
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इस संस्कृत गद्यांश का हिन्दी में अनुवाद इस प्रकार है:

सन्दर्भ: इस गद्यांश में एक बालक के जीवन के प्रारंभिक वर्षों और धार्मिक आस्थाओं का वर्णन किया गया है।

अनुवाद:
"जन्म के दसवें दिन ही पिता ने यह विचार किया कि 'शिव की पूजा करनी चाहिए' और उसी दिन से उन्होंने अपने पुत्र का नाम 'मूलशंकर' रखा। आठ वर्ष की आयु में उन्होंने अपने पुत्र का उपनयन संस्कार कराया। जब वह तेरह वर्ष के हुए, तब उनके पिता ने उन्हें शिवरात्रि का व्रत करने के लिए कहा। पिता की आज्ञा का पालन करते हुए मूलशंकर ने पूरे व्रत का विधिपूर्वक पालन किया।"

यह गद्यांश मूलशंकर के जीवन के प्रारंभिक धार्मिक संस्कारों और उनके पिता की शिक्षा के माध्यम से उनके अनुशासन और धार्मिक प्रतिबद्धता को दर्शाता है।


Question 52:

अतीते प्रथमकल्पे जनाः एकमभिरूपं सौभाग्य प्राप्तं सर्वाकारपरिपूर्णं पुरुषं राजानमकुर्वन् । चतुष्पदा १. अपि सन्निपत्य एकं सिंह राजानमकुर्वन् । ततः शकुनिगणाः हिमवत्-प्रदेशे एकस्मिन् पाषाणे सन्निपत्य ‘मनुष्येषु' राजा प्रज्ञायते तथा चतुष्पदेषु च । अस्माकं पुनरन्तरे राजा नास्ति । अराजको वासो नाम न वर्तते।

Correct Answer:
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इस संस्कृत गद्यांश का हिन्दी में अनुवाद इस प्रकार है:

सन्दर्भ: यह गद्यांश एक काल्पनिक कहानी का वर्णन करता है, जहाँ राजा के बिना समाज का अस्तित्व और जीवन की परिस्थितियाँ जताई गई हैं।

अनुवाद:
"प्राचीन काल में लोग एक ऐसे राजा की पूजा करते थे, जो सौभाग्य और सम्पूर्णता से परिपूर्ण था, और सर्वथा शुभ गुणों से युक्त था। चार पैर वाले जीव भी एक सिंह राजा की पूजा करते थे। फिर, पक्षियों के झुंड ने हिमालय क्षेत्र में एक पाषाण पर बैठकर यह आह्वान किया कि मनुष्यों में राजा का सर्वोच्च स्थान होता है, और चतुष्पदों में भी यह श्रेष्ठता विद्यमान होती है। लेकिन हमारे समय में, राजा का अस्तित्व नहीं है, और 'अराजकता' का शासन किसी भी स्थान पर नहीं पाया जाता।"

यह गद्यांश यह बताता है कि अतीत में राजा का शासन था, और समाज और जीवों के बीच राजा की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण मानी जाती थी, लेकिन वर्तमान में इस तरह का कोई राजतंत्र नहीं है।


Question 53:

निम्नलिखित श्लोकों का हिन्दी में संदर्भ सहित अनुवाद कीजिए:
उदेति सविता ताम्रस्ताम् एवास्तमेति च ।
सम्पत्तौ च विपत्तौ च महतामेकरूपता ।।

Correct Answer:
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सन्दर्भ: यह श्लोक जीवन के परिवर्तनशील और अनिश्चित रूप को दर्शाता है। इसमें सूर्य के उदय और अस्त होने का उदाहरण देते हुए यह बताया गया है कि जैसे सूर्य का उदय और अस्त होना नियमित रूप से होता है, वैसे ही महात्माओं के जीवन में भी अच्छे और बुरे समय आते रहते हैं। यह श्लोक यह भी संकेत करता है कि विपत्ति और समृद्धि के समय में महात्मा वही रहते हैं, उनका आंतरिक गुण वही बना रहता है।

अनुवाद:
"सूर्य की तरह, जो ताम्र (लाल) रंग में उदित होता है और फिर उसी रंग में अस्त होता है, वैसे ही महात्माओं का जीवन भी परिवर्तनशील होता है। उनके जीवन में समृद्धि और विपत्ति दोनों ही आते हैं, लेकिन उनके आंतरिक गुण और रूप में कोई परिवर्तन नहीं आता।"

यह श्लोक जीवन के उतार-चढ़ाव को दर्शाता है और यह सिखाता है कि महात्मा समृद्धि और विपत्ति के बावजूद अपने गुणों और धैर्य में समान रहते हैं।


Question 54:

मत्ता गजेन्द्राः मुदिता गवेन्द्राः वनेषु विक्रान्ततरा मृगेन्द्राः ।
रम्या नगेन्द्राः निभृता नरेन्द्राः प्रकीडितो वारिधरैः सुरेन्द्रः ।।

Correct Answer:
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सन्दर्भ: यह श्लोक प्रकृति, पशु, और मनुष्य के गुणों की तुलना करते हुए एक महान और बलशाली राजा की महिमा का वर्णन करता है। इसमें विभिन्न जीवों और शक्तिशाली नेताओं की महानता और विशेषताओं को व्यक्त किया गया है। श्लोक यह सिखाता है कि प्रत्येक जीव और नेता अपने स्थान पर सर्वोत्तम होता है, लेकिन वास्तविक श्रेष्ठता और महानता भगवान की होती है, जो सभी प्राणियों के ऊपर हैं।

अनुवाद:
"गजेन्द्र (हाथी) अपनी शक्ति से प्रसन्न होते हैं, ग्वालिन (गायों के राजा) वन में खुश रहते हैं, मृगों में सिंह सबसे बलशाली होते हैं, पर्वतों के राजा अत्यंत रमणीय होते हैं, और मनुष्यों में भी श्रेष्ठ नरेन्द्र होते हैं। लेकिन सभी देवताओं का स्वामी समुद्र का राजा है, जो सर्वशक्तिमान और श्रेष्ठ है।"

यह श्लोक हमें यह बताता है कि सभी जीवों की महानता अपने स्थान पर ही सर्वोत्तम होती है, लेकिन भगवान या देवता सर्वश्रेष्ठ होते हैं।


Question 55:

वर्षा काले के मत्ताः भवन्ति ?

Correct Answer:
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इस प्रश्न का उत्तर संस्कृत में देते समय, वर्षा ऋतु में किसानों की गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए उत्तर दें। वर्षा ऋतु में किसान खेत जोतते हैं और अन्न उगाते हैं। अतः उत्तर है: "वर्षकाले कृषकाः अन्नं कृषन्ति।"


Question 56:

दुर्योधनः कः आसीत् ?

Correct Answer:
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प्रश्न में दुर्गोष्ठ की पहचान और उसकी भूमिका पर ध्यान दें। दुर्गोष्ठ एक वीर और बलवान सेनापति था। उसका उत्तर होगा: "दुर्गोष्ठः बलवान् सेनापतिः आसीत्।"


Question 57:

मालवीयः कुत्र अध्यापनम् आरब्धवान् ?

Correct Answer:
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इस प्रश्न का उत्तर देते समय, "मालती" और उसके प्रसंग का उल्लेख करें। उत्तर होगा: "मालतीये विद्याधरः अध्यायानम् आरभवान्।" यह संस्कृत व्याकरण के अनुसार सही है।


Question 58:

का भाषा सर्वासाम् आर्यभाषाणां जननी ?

Correct Answer:
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संस्कृत को सभी आर्य भाषाओं की जननी माना जाता है। इसका उत्तर होगा: "संस्कृतभाषा सर्वासां आर्यभाषाणां जननी।" उत्तर व्याकरण और संदर्भ दोनों में सही है।


Question 59:

'शांत' अथवा 'वात्सल्य' रस की परिभाषा लिखकर उसका उदाहरण दीजिए।

Correct Answer:
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'शांत' रस और 'वात्सल्य' रस दोनों भारतीय काव्यशास्त्र में भावनाओं के रस के रूप में महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं।

शांत रस:
शांत रस को शांति और सुख का रस कहा जाता है, जो मानसिक संतोष और आत्मिक शांति की भावना से जुड़ा होता है। यह रस तब उत्पन्न होता है जब व्यक्ति के हृदय में निरंतर संतोष, शांति और शुद्धता की भावना जागृत होती है। शांत रस को विशेष रूप से भगवान की उपासना, ध्यान और साधना के समय अनुभव किया जाता है, जब व्यक्ति पूरी तरह से मानसिक शांति प्राप्त करता है।

वात्सल्य रस:
वात्सल्य रस उस भाव को कहते हैं जो माता-पिता के अपने बच्चों के प्रति अथवा गुरु और शिष्य के रिश्ते में एक गहरी ममता और स्नेह से उत्पन्न होता है। यह रस प्रेम, स्नेह और दया से संबंधित है, जो व्यक्ति को अपार वात्सल्य और ममता की अनुभूति कराता है।

उदाहरण:
'वात्सल्य रस' का एक उदाहरण भगवान श्री कृष्ण और माता यशोदा के बीच का संवाद है। जब माता यशोदा श्री कृष्ण को गोवर्धन पर्वत उठाते हुए देखती हैं, तो उनका प्रेम और चिंता का भाव एक गहरे वात्सल्य रस में बदल जाता है। यह दृश्य वात्सल्य रस का आदर्श उदाहरण है, जहां माता अपने पुत्र के प्रति अत्यधिक स्नेह और ममता का अनुभव करती हैं।


शांत रस का उदाहरण: श्रीराम का ध्यान करते समय शांति और संतोष की अनुभूति करना।
वात्सल्य रस का उदाहरण: श्री कृष्ण और माता यशोदा के बीच संवाद, जहां माता अपने बच्चे के प्रति अत्यधिक प्रेम और चिंता दर्शाती हैं।


Question 60:

'अनुप्रास' अथवा 'अतिशयोक्ति' अलंकार की परिभाषा उदाहरण सहित लिखिए।

Correct Answer:
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'अनुप्रास' और 'अतिशयोक्ति' दोनों ही अलंकार हैं जो काव्यशास्त्र में विशेष प्रभाव उत्पन्न करने के लिए प्रयुक्त होते हैं।

अनुप्रास अलंकार:
अनुप्रास अलंकार तब होता है जब किसी काव्य में शब्दों या ध्वनियों का पुनरावृत्ति होती है, विशेष रूप से समान ध्वनि वाले वर्णों का प्रयोग। यह अलंकार काव्य को लयबद्ध और संगीतमय बनाता है, और इसका प्रभाव पाठक पर विशेष रूप से गहरा होता है।

उदाहरण:
"प्यारे पंखों वाले पक्षी पर, प्रभात प्रकटित पवन प्रगटते हैं।"
इस वाक्य में 'प' ध्वनि की पुनरावृत्ति से अनुप्रास अलंकार का प्रयोग हुआ है।

अतिशयोक्ति अलंकार:
अतिशयोक्ति अलंकार तब होता है जब किसी गुण, कार्य या विशेषता का अत्यधिक या अतिशयोक्तिपूर्ण रूप में वर्णन किया जाता है, जो वास्तविकता से कहीं अधिक होता है। यह अलंकार किसी चीज़ की महिमा, बल, या शक्ति को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत करने के लिए उपयोग किया जाता है।

उदाहरण:
"वह एक साथ हजारों काम कर सकता है!"
यहां पर 'हजारों काम' का अतिशयोक्ति के रूप में उपयोग किया गया है, क्योंकि एक व्यक्ति एक साथ इतने काम नहीं कर सकता।


अनुप्रास अलंकार का उदाहरण: "प्यारे पंखों वाले पक्षी पर, प्रभात प्रकटित पवन प्रगटते हैं।"
अतिशयोक्ति अलंकार का उदाहरण: "वह एक साथ हजारों काम कर सकता है!"


Question 61:

'सवैया' अथवा 'बरवै' छन्द की परिभाषा उदाहरण सहित लिखिए।

Correct Answer:
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'सवैया' और 'बरवै' दोनों ही भारतीय काव्यशास्त्र में महत्वपूर्ण छन्द हैं, जो काव्य की लय और ताल को संरचित करने के लिए प्रयोग किए जाते हैं।

सवैया छन्द:
सवैया छन्द का प्रयोग विशेष रूप से हिंदी काव्य में किया जाता है। यह एक प्रकार का चौपाई है जिसमें प्रत्येक पंक्ति में आठ (८) मात्राएँ होती हैं। सवैया छन्द में लय की विशेषता होती है और यह काव्य को ताल में बांधने में सहायक होता है। सवैया छन्द का प्रयोग प्रायः वीर रस, श्रृंगार रस या भक्ति रस में किया जाता है।

उदाहरण:
"सदैव सच्चा हो जो मनुष्य, वही सिखलाता है ज्ञान।
विपत्ति में जो साहस रखे, वही होता है महान।"

यहां पर प्रत्येक पंक्ति में आठ मात्राएँ हैं, जो इसे सवैया छन्द बनाती हैं।

बरवै छन्द:
बरवै छन्द हिंदी काव्य का एक और प्रसिद्ध छन्द है। यह छन्द ११-१०-११-१० के मात्रिक संरचना में होता है, अर्थात प्रत्येक पंक्ति में पहले ११ और फिर १० मात्राएँ होती हैं। बरवै छन्द का प्रयोग भावनात्मक और श्रृंगारिक कविताओं में अधिक किया जाता है।

उदाहरण:
"सपनों की रातें हो, चाँद के संग गुजरें, (११ मात्राएँ)
तेरे बिना सब कुछ सूना है, दिल मेरा तुझसे भरें। (१० मात्राएँ)"

यहां पर पहली पंक्ति में ११ और दूसरी पंक्ति में १० मात्राएँ हैं, जो इसे बरवै छन्द बनाती हैं।


सवैया छन्द का उदाहरण: "सदैव सच्चा हो जो मनुष्य, वही सिखलाता है ज्ञान।"
बरवै छन्द का उदाहरण: "सपनों की रातें हो, चाँद के संग गुजरें, तेरे बिना सब कुछ सूना है।"


Question 62:

मेरा प्रिय खेल

Correct Answer:
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मुझे खेलों का बहुत शौक है और उनमें से मेरा प्रिय खेल क्रिकेट है। क्रिकेट एक बहुत ही लोकप्रिय खेल है जिसे दुनिया भर में लाखों लोग पसंद करते हैं। यह खेल विशेष रूप से भारत में बहुत प्रसिद्ध है। क्रिकेट न केवल एक खेल है, बल्कि यह एक जश्न और उत्सव का रूप ले चुका है।

क्रिकेट का इतिहास:
क्रिकेट का इतिहास बहुत पुराना है। यह खेल इंग्लैंड से उत्पन्न हुआ था और धीरे-धीरे पूरे विश्व में फैल गया। भारतीय उपमहाद्वीप में क्रिकेट की शुरुआत ब्रिटिश काल में हुई थी और फिर यह खेल भारत में बहुत ही लोकप्रिय हो गया। आज क्रिकेट के विभिन्न रूप हैं जैसे टेस्ट मैच, वनडे और टी20, जो दर्शकों को एक अलग अनुभव प्रदान करते हैं।

क्रिकेट खेल के नियम:
क्रिकेट में दो टीमें होती हैं, प्रत्येक टीम में ११ खिलाड़ी होते हैं। इस खेल में गेंदबाजी, बैटिंग और फील्डिंग की भूमिका होती है। बत्तिंग टीम के खिलाड़ी गेंदबाज द्वारा फेंकी गई गेंद को बैट से हिट करते हैं, और उसका उद्देश्य रन बनाना होता है। दूसरी टीम का उद्देश्य बल्लेबाज को आउट करना होता है। क्रिकेट के नियम कुछ जटिल हो सकते हैं, लेकिन खेलने में बहुत मज़ा आता है।

मुझे क्रिकेट क्यों पसंद है?
मैं क्रिकेट इसलिए पसंद करता हूँ क्योंकि यह खेल टीमवर्क को बढ़ावा देता है। क्रिकेट में हर खिलाड़ी की भूमिका महत्वपूर्ण होती है, चाहे वह बल्लेबाज हो, गेंदबाज हो या फील्डर हो। जब हमारी टीम एकजुट होकर खेलती है, तो एकता और सहयोग की भावना उत्पन्न होती है। क्रिकेट में हर क्षण रोमांचक होता है, और हर रन, हर विकेट, और हर चौका-छक्का मैच का परिणाम बदल सकता है।

मैं विशेष रूप से क्रिकेट के महान खिलाड़ियों को देखना पसंद करता हूँ। खिलाड़ियों जैसे सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली और महेन्द्र सिंह धोनी ने क्रिकेट को न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में एक नया मुकाम दिया है। इन खिलाड़ियों के खेल को देखकर मुझे हमेशा प्रेरणा मिलती है और मैं भी क्रिकेट में अच्छा खिलाड़ी बनने की कोशिश करता हूँ।

क्रिकेट का मेरे जीवन में महत्व:
क्रिकेट मेरे जीवन में न केवल एक खेल है, बल्कि यह एक सिखाने वाला अनुभव है। इस खेल ने मुझे धैर्य, कड़ी मेहनत, और टीमवर्क के महत्व को समझाया है। क्रिकेट खेलते हुए मैंने बहुत कुछ सीखा है, जैसे कि कैसे हर परिस्थिति का सामना करना चाहिए और कभी हार नहीं माननी चाहिए। खेल के दौरान किसी भी टीम के खिलाड़ी के साथ सामंजस्यपूर्ण कार्य करना बहुत महत्वपूर्ण होता है, और क्रिकेट मुझे यह सिखाता है।

क्रिकेट और समाज:
क्रिकेट केवल एक खेल नहीं है, यह समाज में एकता और सामूहिक भावना को भी बढ़ावा देता है। जब कोई बड़ी क्रिकेट टीम जीतती है, तो देश भर में खुशी का माहौल होता है। यह खेल न केवल देशवासियों को एकजुट करता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विभिन्न देशों के बीच दोस्ती का संदेश देता है।

समाप्ति:
क्रिकेट मेरा प्रिय खेल है क्योंकि इसमें न केवल शारीरिक कौशल की आवश्यकता होती है, बल्कि मानसिक क्षमता और एकजुटता का भी महत्व होता है। इस खेल ने मुझे जीवन की महत्वपूर्ण बातें सिखाई हैं। क्रिकेट मुझे सिखाता है कि कड़ी मेहनत, समर्पण और टीमवर्क से कोई भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है।


Question 63:

शिक्षा का महत्त्व

Correct Answer:
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शिक्षा मानव जीवन का अभिन्न हिस्सा है और यह समाज की प्रगति, विकास और समृद्धि में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। शिक्षा केवल पुस्तकों तक सीमित नहीं होती, बल्कि यह जीवन को समझने, उसे सुधारने और दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण तरीके से जीने के लिए आवश्यक होती है।

शिक्षा का व्यक्तित्व पर प्रभाव:
शिक्षा का व्यक्ति के व्यक्तित्व पर गहरा प्रभाव पड़ता है। यह न केवल ज्ञान और जानकारी प्रदान करती है, बल्कि सोचने, समझने और समस्याओं को हल करने की क्षमता भी विकसित करती है। शिक्षा से व्यक्ति की सोच में परिपक्वता आती है, जिससे वह जीवन के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाता है। एक शिक्षित व्यक्ति अधिक जिम्मेदार, ईमानदार और समाज के प्रति जागरूक होता है।

समाज के लिए शिक्षा का महत्त्व:
शिक्षा समाज के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह समाज में बुराइयों को समाप्त करने और सुधार करने की क्षमता प्रदान करती है। एक शिक्षित समाज आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टिकोण से सशक्त बनता है। शिक्षा से बेरोज़गारी कम होती है, सामाजिक असमानताएँ घटती हैं और सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं। इसके अलावा, शिक्षा समाज में महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता सुनिश्चित करती है, जिससे समाज में शांति और समृद्धि का वातावरण बनता है।

शिक्षा और आर्थिक विकास:
शिक्षा का आर्थिक विकास में भी अत्यधिक महत्व है। एक राष्ट्र की प्रगति उस राष्ट्र के नागरिकों की शिक्षा पर निर्भर करती है। जब लोग शिक्षा प्राप्त करते हैं, तो उनकी कार्यक्षमता और उत्पादकता बढ़ती है, जो अंततः देश के समग्र आर्थिक विकास में योगदान करती है। शिक्षा से न केवल रोजगार के अवसर बढ़ते हैं, बल्कि यह नवाचार, उद्योगों की वृद्धि और व्यावसायिक दक्षता में भी मदद करती है।

शिक्षा का भविष्य निर्माण में योगदान:
शिक्षा बच्चों के भविष्य निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह उनके मानसिक विकास और बौद्धिक क्षमता को बढ़ाती है, जो उन्हें अपने जीवन में अच्छे निर्णय लेने में मदद करती है। शिक्षा बच्चों में सोचने, सवाल करने और समाधान खोजने की प्रवृत्ति विकसित करती है। इसके परिणामस्वरूप, वे अपनी सोच को स्पष्ट करते हुए समाज में सुधार करने के लिए प्रेरित होते हैं।

शिक्षा और नैतिक मूल्य:
शिक्षा का एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि यह नैतिक मूल्यों का प्रचार करती है। शिक्षा से व्यक्ति में सत्य, न्याय, दया, ईमानदारी और सहयोग जैसे गुण विकसित होते हैं। यह समाज में आपसी सद्भाव और स्नेह बढ़ाती है, और व्यक्ति को अपने कर्तव्यों और जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक बनाती है।

समाप्ति:
इस प्रकार, शिक्षा केवल एक व्यक्ति के जीवन को सुधारने का साधन नहीं है, बल्कि यह समाज के विकास, समृद्धि और खुशहाली का भी मुख्य आधार है। यह एक राष्ट्र की ताकत को बढ़ाती है और लोगों को उनके अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करती है। शिक्षा के बिना कोई भी समाज प्रगति नहीं कर सकता, और यही कारण है कि शिक्षा का महत्त्व अतुलनीय है।


Question 64:

भ्रष्टाचार: कारण और निवारण

Correct Answer:
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भ्रष्टाचार किसी भी समाज या राष्ट्र के लिए एक गंभीर समस्या है। यह न केवल आर्थिक विकास में रुकावट डालता है, बल्कि सामाजिक असमानताओं को भी बढ़ावा देता है। भ्रष्टाचार के कारण समाज में असंतोष और गहरी खाई उत्पन्न होती है, जिससे जन सामान्य की भलाई पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। इस पर काबू पाना अत्यंत आवश्यक है, और इसके निवारण के लिए कुछ ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है।

भ्रष्टाचार के कारण:

गरीबी और बेरोज़गारी:
भ्रष्टाचार का मुख्य कारण समाज में व्याप्त गरीबी और बेरोज़गारी है। जब लोग अपने और अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए संघर्ष करते हैं, तो वे भ्रष्टाचार के रास्ते पर चलने के लिए मजबूर हो जाते हैं। सरकारी योजनाओं और सुविधाओं का फायदा उठाने के लिए लोग रिश्वत देने या लेने में संकोच नहीं करते।

राजनीतिक अस्थिरता:
राजनीतिक अस्थिरता भी भ्रष्टाचार के कारणों में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। जब नेताओं के बीच शक्ति संघर्ष और अस्थिरता होती है, तो वे अपनी निजी लाभ के लिए सरकारी धन का दुरुपयोग करते हैं। चुनावों के समय जनता को आकर्षित करने के लिए कई बार वादे किए जाते हैं, जिनकी कोई वास्तविकता नहीं होती, जिससे भ्रष्टाचार बढ़ता है।

शासन की कमजोरी:
भ्रष्टाचार बढ़ने का एक और कारण सरकार और प्रशासन की कमजोरी है। यदि अधिकारियों द्वारा पारदर्शिता और जवाबदेही नहीं होती, तो वे बिना किसी डर के गलत काम करते हैं। जब सरकारी तंत्र भ्रष्ट हो जाता है, तो यह पूरी व्यवस्था को प्रभावित करता है।

सामाजिक मान्यताएँ और आस्थाएँ:
कभी-कभी भ्रष्टाचार को समाज में सामान्य माना जाता है। अगर समाज में यह मान्यता बन जाए कि बिना रिश्वत के काम नहीं हो सकते, तो लोग इसे अपने दैनिक जीवन का हिस्सा मानने लगते हैं।

भ्रष्टाचार के निवारण के उपाय:

शासन में पारदर्शिता और जवाबदेही:
भ्रष्टाचार को रोकने के लिए प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही का होना बहुत आवश्यक है। यदि सभी सरकारी कार्यों में पारदर्शिता हो और लोगों को उनके काम के परिणामों के लिए जवाबदेह ठहराया जाए, तो भ्रष्टाचार कम होगा।

शिक्षा और जागरूकता:
शिक्षा के माध्यम से लोगों को भ्रष्टाचार के दुष्परिणामों के बारे में जागरूक करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब लोग जानेंगे कि भ्रष्टाचार समाज और राष्ट्र को किस हद तक नुकसान पहुँचाता है, तो वे इसे बढ़ावा नहीं देंगे।

कानूनी सख्ती:
कानूनी दंड और कड़ी सजा देने से भ्रष्टाचार पर नियंत्रण पाया जा सकता है। सरकार को भ्रष्टाचार से संबंधित मामलों में सख्त और त्वरित कार्यवाही करनी चाहिए। यदि दोषियों को कठोर सजा दी जाए, तो यह दूसरों को भी गलत काम करने से रोकता है।

सार्वजनिक निगरानी और नज़र रखी जाए:
सार्वजनिक निगरानी की प्रक्रिया को मजबूत किया जाना चाहिए। भ्रष्टाचार को समाप्त करने के लिए नागरिकों को अपने अधिकारों और कर्तव्यों के प्रति जागरूक करना चाहिए। सरकारी योजनाओं के कार्यान्वयन और सार्वजनिक धन के उपयोग पर कड़ी नज़र रखनी चाहिए।

समान अवसर और रोजगार:
गरीबी और बेरोज़गारी को दूर करने के लिए शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़ाए जाने चाहिए। जब लोगों के पास रोजगार होगा और उनका जीवन स्तर बेहतर होगा, तो उन्हें भ्रष्टाचार के रास्ते पर जाने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।

समाप्ति:
भ्रष्टाचार एक बड़ी समस्या है, लेकिन यदि सभी लोग मिलकर इसके निवारण के लिए काम करें, तो यह निश्चित रूप से कम किया जा सकता है। सरकार, नागरिक और समाज को एकजुट होकर भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध छेड़ने की आवश्यकता है। केवल इसी प्रकार हम एक भ्रष्टाचार मुक्त समाज की कल्पना कर सकते हैं।


Question 65:

सादा जीवन उच्च विचार

Correct Answer:
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"सादा जीवन उच्च विचार" एक प्रसिद्ध उक्ति है, जो जीवन के सरल और संतुलित दृष्टिकोण को प्रकट करती है। यह उक्ति हमें यह संदेश देती है कि जीवन को संयमित और सरल बनाए रखना चाहिए, ताकि हम अपने विचारों और कार्यों में ऊँचाई और नैतिकता को बनाए रख सकें। इस विचारधारा का पालन करके हम जीवन में संतुलन, शांति और समृद्धि पा सकते हैं।

सादा जीवन का महत्व:
सादा जीवन का अर्थ है साधारण और सुखी जीवन जीना, जिसमें विलासिता और बाहरी दिखावा न हो। यह जीवन शैली न केवल शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए लाभकारी है, बल्कि यह व्यक्ति को समाज में सही तरीके से जीने के लिए प्रेरित करती है। सादा जीवन अपने भीतर संतोष और शांति लाता है, क्योंकि इसमें केवल आवश्यकताओं को पूरा करने पर ध्यान दिया जाता है और फालतू की इच्छाओं से बचा जाता है।

सादा जीवन जीने से व्यक्ति अपने संसाधनों का सही उपयोग करता है और आंतरिक संतुष्टि प्राप्त करता है। अधिक भौतिक वस्तुओं के प्रति आकर्षण से बचकर, वह अपने वास्तविक उद्देश्य की ओर ध्यान केंद्रित करता है और समाज में एक अच्छा नागरिक बनता है।

उच्च विचार का महत्व:
उच्च विचारों का मतलब है, उच्च नैतिकता, अच्छे उद्देश्य और सकारात्मक दृष्टिकोण रखना। जब हम अपने विचारों को ऊँचा रखते हैं, तो हमारी कार्यशैली भी ऊँची होती है। उच्च विचारों से हमारा दृष्टिकोण जीवन के प्रति सकारात्मक होता है, और हम हर कार्य में एक उच्च उद्देश्य को देखते हैं। इस प्रकार, अच्छे और सकारात्मक विचार व्यक्ति की पूरी जीवनशैली को प्रभावित करते हैं और उसे समाज में उच्च स्थान पर पहुंचाते हैं।

उच्च विचारों से प्रेरित होकर, हम समाज में बदलाव लाने, दूसरों की मदद करने, और खुद को बेहतर बनाने की दिशा में काम कर सकते हैं। उच्च विचारों से हमारे जीवन में समृद्धि, शांति और उद्देश्यपूर्णता आती है।

सादा जीवन और उच्च विचार का सामंजस्य:
"सादा जीवन उच्च विचार" का पालन करने से व्यक्ति को आंतरिक शांति, मानसिक संतुलन और सामाजिक समृद्धि मिलती है। सादा जीवन जीने से व्यक्ति अपने भीतर की इच्छाओं और लालच को नियंत्रित करता है, और उच्च विचारों से वह अपने जीवन को उद्देश्यपूर्ण बनाता है। यह सिद्धांत हमें यह सिखाता है कि बाहरी दिखावे और भौतिक वस्तुओं से बढ़कर, जीवन का असली उद्देश्य हमारी आंतरिक शांति, अच्छे कार्य और उच्च विचारों में छिपा होता है।

समाप्ति:
इसलिए, "सादा जीवन उच्च विचार" का पालन करना जीवन को सार्थक और सुखमय बनाने का एक महत्वपूर्ण उपाय है। हमें अपने विचारों को ऊँचा रखते हुए जीवन को सरल और संयमित बनाना चाहिए, ताकि हम न केवल अपनी व्यक्तिगत उन्नति कर सकें, बल्कि समाज के प्रति भी अपनी जिम्मेदारी निभा सकें।


Question 66:

'हरे' का संधि-विच्छेद है:

  • (अ) हर + ए
  • (ब) हर + ऐ
  • (स) हरे + ए
  • (द) हर + ऐ
Correct Answer: (अ) हर + ए
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'हरे' का संधि-विच्छेद इस प्रकार है: हर + ए। यह अयादि संधि का उदाहरण है, जिसमें 'अ' या 'आ' के बाद स्वर 'ए' आता है।


Question 67:

'वनेत्र' का संधि-विच्छेद है:

  • (अ) वन + अत्र
  • (ब) वने + अत्र
  • (स) वने + एत्र
  • (द) वन + आत्र
Correct Answer: (ब) वने + अत्र
View Solution

'वनेत्र' का संधि-विच्छेद इस प्रकार है: वने + अत्र। यह दीर्घ संधि का उदाहरण है, जिसमें स्वर 'ए' और 'अ' के मिलने से 'ए' बनता है।


Question 68:

'रामस्वरति' में संधि है:

  • (अ) स्वर
  • (ब) व्यंजन
  • (स) विसर्ग
  • (द) यण
Correct Answer: (स) विसर्ग
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'रामस्वरति' में विसर्ग संधि है। इसमें 'रामः' और 'स्वरति' शब्द मिलकर 'रामस्वरति' बनाते हैं। यह विसर्ग संधि का नियम है, जिसमें विसर्ग का स्वर में परिवर्तन होता है।


Question 69:

आजीवनम्

Correct Answer:
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विग्रह: आज + जीवनम्
समास का नाम: द्विगु समास
व्याख्या: 'आजीवनम्' का अर्थ होता है 'संपूर्ण जीवन' या 'जीवन भर'। यहाँ 'आजीव' और 'जीवन' के दो शब्दों का संयोजन किया गया है। यह द्विगु समास का उदाहरण है, जिसमें दोनों पदों का योग किया गया है।


Question 70:

श्वेताम्बरम्

Correct Answer:
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विग्रह: श्वेत + अम्बरम्
समास का नाम: बहुव्रीहि समास
व्याख्या: 'श्वेताम्बरम्' का अर्थ होता है 'सफेद वस्त्र पहनने वाला', यानी ऐसा व्यक्ति जो सफेद वस्त्र पहनता है। यह बहुव्रीहि समास का उदाहरण है क्योंकि इसमें एक विशेषता ('श्वेत') और वस्त्र ('अम्बर') का संयोजन हुआ है, जिससे किसी विशेष व्यक्ति का वर्णन किया जाता है।


Question 71:

महाशयः

Correct Answer:
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विग्रह: महा + शयः
समास का नाम: द्विगु समास
व्याख्या: 'महाशयः' का अर्थ होता है 'महान व्यक्ति'। यह द्विगु समास का उदाहरण है, क्योंकि इसमें दो शब्दों 'महा' (महान) और 'शय' (व्यक्ति) का संयोजन हुआ है। इस समास में 'महा' शब्द विशेषता का निर्धारण करता है और 'शय' शब्द व्यक्ति को व्यक्त करता है।


Question 72:

अपने क्षेत्र के पार्क को विकसित करने के लिए नगर-निगम के मुख्य उद्यान-निरीक्षक को एक पत्र लिखिए।



अपने क्षेत्र के पार्क को विकसित करने के लिए पत्र:

Correct Answer:
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सेवा में,

मुख्य उद्यान-निरीक्षक,

नगर-निगम,

(शहर का नाम)


मान्यवर,

सविनय निवेदन है कि हमारे क्षेत्र (क्षेत्र का नाम) का पार्क अत्यधिक उपेक्षित अवस्था में है। पार्क में न तो बैठने की उचित व्यवस्था है और न ही पौधों का सही रखरखाव किया जा रहा है। बच्चे खेल-कूद नहीं कर पाते और वृद्धजन के लिए टहलने की सुविधाएँ नहीं हैं।

अतः आपसे निवेदन है कि पार्क को विकसित करने के लिए उचित कदम उठाएँ। नई झूलों की व्यवस्था, पेड़ों की कटाई-छँटाई, और सफाई का विशेष ध्यान दिया जाए।

कृपया हमारे निवेदन पर ध्यान दें।

धन्यवाद।


भवदीय,

(आपका नाम)

(पता)


Question 73:

विद्यालय की वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर अपने छोटे भाई को बधाई देते हुए एक पत्र लिखिए।

Correct Answer:
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प्रिय छोटे भाई,

सप्रेम नमस्ते।

मुझे यह जानकर अत्यधिक खुशी हुई कि तुमने विद्यालय की वाद-विवाद प्रतियोगिता में प्रथम स्थान प्राप्त किया है। यह तुम्हारी मेहनत, लगन, और आत्मविश्वास का परिणाम है। मुझे तुम पर गर्व है।

इस सफलता से तुम्हें और बेहतर करने की प्रेरणा मिलेगी। मुझे विश्वास है कि भविष्य में भी तुम इसी तरह अपने माता-पिता और परिवार का नाम रोशन करते रहोगे।

अपनी पढ़ाई और तैयारी में ध्यान देना। मेरी शुभकामनाएँ हमेशा तुम्हारे साथ हैं।

सस्नेह,

(आपका नाम)


Question 74:

लिखित:

Correct Answer:
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'लिखित' शब्द 'लिख्' धातु से बना है, जिसमें 'क्त' प्रत्यय का योग होता है। यह क्त प्रत्यय का प्रयोग भूतकाल में क्रिया का परिणाम बताने के लिए होता है।


Question 75:

कृत्वा:

Correct Answer:
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'कृत्वा' शब्द 'कृ' धातु से बना है, जिसमें 'क्त्वा' प्रत्यय का योग होता है। यह प्रत्यय क्रिया के संपन्न होने का संकेत देता है।


Question 76:

द्रष्टव्य:

Correct Answer:
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'द्रष्टव्य' शब्द 'दृश्' धातु से बना है, जिसमें 'तव्य' प्रत्यय का योग होता है। यह प्रत्यय 'देखने योग्य' के भाव को व्यक्त करता है।


Question 77:

श्रवणीय:

Correct Answer:
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'श्रवणीय' शब्द 'श्रवण' धातु में 'ीय' प्रत्यय जोड़ने से बना है। इसका अर्थ है 'सुनने योग्य।'


Question 78:

बन्धुत्वम्:

Correct Answer:
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'बन्धुत्वम्' शब्द 'बन्धु' से बना है, जिसमें 'त्व' प्रत्यय का प्रयोग किया गया है। इसका अर्थ है 'भाईचारे का भाव' या 'संबंध का गुण।' प्रत्यय 'त्व' गुण या अवस्था को व्यक्त करता है।


Question 79:

बलवान्:

Correct Answer:
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'बलवान्' शब्द 'बल' से बना है, जिसमें 'वान्' प्रत्यय का प्रयोग होता है। इसका अर्थ है 'जिसके पास बल हो।'


Question 80:

गृहं प्रति गच्छ।

Correct Answer:
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वाक्य में 'गृहं प्रति' का प्रयोग दर्शाता है कि गमन की दिशा 'गृह' की ओर है। 'प्रति' के साथ द्वितीया विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।


Question 81:

रामेण सह सीता वनम् अगच्छत्।

Correct Answer:
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वाक्य में 'रामेण सह' का प्रयोग दर्शाता है कि 'राम' के साथ 'सीता' गई। 'सह' के साथ तृतीया विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।


Question 82:

अग्नये स्वाहा।

Correct Answer:
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वाक्य में 'अग्नये स्वाहा' का प्रयोग दर्शाता है कि 'अग्नि' को समर्पित किया गया। 'स्वाहा' के साथ चतुर्थी विभक्ति का प्रयोग किया जाता है।


UP Board Class 12 Previous Years Question Papers

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